Wednesday, 9 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

भगवान राम की सरलता देखकर गुरु प्रसन्न हो गये और बोले कि राम ! तुम क्या लेकर आये हो ? श्रीराम बोले - महाराज ! फूल लेकर आये हैं । उन्होने कहा - संसार में फल के प्रेमी तो बहुत हैं, पर फूल के प्रेमी कम हैं । कर्मफल के प्रेमी बहुत हैं, परन्तु कर्म के प्रेमी बहुत कम हैं । यह जो तुम पुष्प लेकर आये हो, मेरी आज्ञा का जो पालन किया, यह तुम्हारी साधन-प्रीति का परिचायक है, किन्तु साधना कभी निष्फल नहीं होती । मेरी आज्ञा से तुम पुष्प लेकर आये हो, तो लो तुम्हारे लिए यह फल लिये बैठा हूँ । महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को आर्शीवाद दिया -
        सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे ।
        रामु लखनु सुनि भए सुखारे ।।
भक्ति को पाने के लिए सरलता ही सबसे महत्वपूर्ण गुण है । इसलिए भगवान राम ने अपने चरित्र के माध्यम से इस सत्य को प्रकट किया । वे स्वयं अत्यंत सरल हैं । इसी सरलता के मार्ग से उन्होंने भक्तिदेवी को पाया और अपने भक्तों से भी इसी सरलता की अपेक्षा रखते हैं । सरलता ही उन्हें सर्वाधिक प्रिय है और यही सरलता सुग्रीव के चरित्र में तथा उनके प्रिय होने वाले असंख्य भक्तों में विद्यमान है । विभिन्न भक्तों के जीवन में अन्य लक्षणों की भिन्नता हो सकती है, परन्तु जहाँ तक सरलता का प्रश्न है, यह प्रभु के प्रिय समस्त भक्तों में विद्यमान है ।

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