.......कल से आगे ......
पार्वतीजी बड़ी दुखी हुईं, रोने लगीं। हाय ! आपने मेरे पुत्र का शिर काट दिया ? शंकरजी मुस्कराते बोले - पार्वती ! तुमने भूल की, बालक का निर्माण तो दो के द्वारा होता है, तुमने अकेले ही इस बालक का निर्माण कर लिया । इसका अभिप्राय यह है कि जिस गणेश का निर्माण केवल श्रद्धा के द्वारा होगा, उसमें विश्वास का अभाव होगा । श्रद्धा बुद्धितत्त्व है और विश्वास ह्रदयतत्त्व । दोनों का सामंजस्य होना चाहिए । तुमने अकेले ही बालक का निर्माण कर दिया । अच्छा ! कोई बात नहीं है, नया शिर जोड़ देते हैं । इस तरह गणेशजी का गले तक का भाग पार्वतीजी की सृष्टि है और शिर शंकरजी का दिया हुआ है । ये ही गणेशजी हैं, जिनकी हम पूजा करते हैं, जिनका निर्माण पार्वतीजी और शंकरजी के द्वारा हुआ । जो श्रद्धा और विश्वास का समन्वय रूप है ।
पार्वतीजी बड़ी दुखी हुईं, रोने लगीं। हाय ! आपने मेरे पुत्र का शिर काट दिया ? शंकरजी मुस्कराते बोले - पार्वती ! तुमने भूल की, बालक का निर्माण तो दो के द्वारा होता है, तुमने अकेले ही इस बालक का निर्माण कर लिया । इसका अभिप्राय यह है कि जिस गणेश का निर्माण केवल श्रद्धा के द्वारा होगा, उसमें विश्वास का अभाव होगा । श्रद्धा बुद्धितत्त्व है और विश्वास ह्रदयतत्त्व । दोनों का सामंजस्य होना चाहिए । तुमने अकेले ही बालक का निर्माण कर दिया । अच्छा ! कोई बात नहीं है, नया शिर जोड़ देते हैं । इस तरह गणेशजी का गले तक का भाग पार्वतीजी की सृष्टि है और शिर शंकरजी का दिया हुआ है । ये ही गणेशजी हैं, जिनकी हम पूजा करते हैं, जिनका निर्माण पार्वतीजी और शंकरजी के द्वारा हुआ । जो श्रद्धा और विश्वास का समन्वय रूप है ।
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