इन प्रसंगों का मूल आशय यह है कि शरीर के संदर्भ में भी कुटिलता तथा छल-कपट की वृत्ति बड़ी घातक है, क्योंकि इससे रोग भीतर ही भीतर पनपता तथा फैलता रहता है और इसी प्रकार मन के रोगों के संदर्भ में भी, जिनके ह्रदय में अपने दोषों को छिपाने की वृत्ति है, वह स्वयं तो कष्ट भोगता ही है, साथ-साथ दूसरों में भी उस रोग को फैलाता है । किन्तु जो व्यक्ति भगवान के सामने अपने दोषों को बड़ी सरलता से निवेदन करते हुए प्रार्थना करता है, उसके जीवन में भगवान की कृपा से भक्ति की सरलता आती है और उसके मन का यह कुष्ट रोग अर्थात दुष्टता और कुटिलता की वृत्ति दूर हो जाती है ।
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