अहंकार के दो प्रकार के हैं - एक तो समष्टि अहंकार और दूसरा व्यष्टि अहंकार । एक समग्र विराट का 'मैं' और दूसरा हर व्यक्ति का अलग-अलग, खण्ड-खण्ड 'मैं' । इस खण्ड 'मैं' के साथ 'तू' जुड़ा हुआ है अर्थात 'मैं अच्छा तू बुरा', 'मैं बुद्धिमान तू मुर्ख', 'मैं उच्च तू नीच' । 'अखण्ड मैं' यह है, जहाँ 'तू' है ही नहीं, केवल मैं एकमात्र ब्रह्म । शिव वह 'मैं' है जहाँ कोई खण्ड नहीं है, जहाँ व्यक्ति-व्यक्ति का, अलग-अलग, खण्ड-खण्ड 'मैं' समाप्त हो जाता है, जहाँ सारा ब्रह्मांड अपना ही स्वरूप दिखाई देने लगता है, ऐसा बोध होता है कि विविध रूपों में मैं ही हूँ, यह विराट 'अहं' की अनुभूति ही शिव का स्वरूप है । इस विराट 'अहं' को ठीक-ठीक देख लेने पर 'मैं और तू' का भान ही नहीं रह जाता और जहाँ कोई पराया नहीं है, वहाँ विरोध किससे ? जहाँ अपने 'मैं' को छोड़कर कोई दूसरा है ही नहीं, वहाँ किसी को क्षुद्र या छोटा समझने का प्रश्न ही कहाँ उठता है ? यह वेदान्त की भाषा है । ज्ञान की दृष्टि में यह जो कुछ है, वहाँ सब 'मैं' ही 'मैं' है ।
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