Thursday, 3 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भक्ति पाने के संदर्भ में भगवान राम की यात्रा कहाँ से शुरू होती है ? - गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान राघवेन्द्र लक्ष्मणजी को साथ लेकर पुष्प लेने पुष्पवाटिका की ओर चले । पुष्प माने क्या ? पुष्प का एक नाम है सुमन। भगवान सुमन चुनने जा रहे हैं। यह सुमन शब्द बड़ा प्रतीकात्मक है । सुमन का एक अर्थ है फूल और दूसरा अर्थ है सुंदर मन । जैसे सुमन में सौरभ होता है, उसी तरह सुंदर मन में भी भक्ति का सौरभ होता है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे सौरभ का प्रेमी सुमन का संग्रह करता है, उसी तरह भक्ति-सौरभ के प्रेमी भगवान राम सुंदर मन का चयन करते हैं । भगवान राम सुमन चयन कर रहे थे, इसी बीच उनके कानों में सीताजी के आभूषणों की ध्वनि सुनाई पड़ी । उनके आभूषणों की ध्वनि क्या है ? यह ध्वनि है श्रुति । अभिप्राय यह है कि श्रुति के माध्यम से भक्तिदेवी के आगमन की सूचना प्राप्त होती है । भक्ति की ओर प्रस्थान संत की कृपा से और भक्ति का आगमन श्रुति के माध्यम से । नवधाभक्ति के प्रसंग में कहा गया है -
       प्रथम भगति संतन्ह कर संगा ।
       दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ।।
पहले सत्संग और दूसरे क्रम में श्रवण । वैसे तो गोस्वामीजी लिख सकते थे कि भगवान राम फूल चुनने गये और अचानक श्रीसीताजी वहाँ आ गयीं । उन्होंने सीताजी को देखा और उनके सौंदर्य पर मुग्ध हो गये । किन्तु गोस्वामीजी कहते हैं कि  नहीं ! भगवान ने अभी सीताजी को नहीं देखा है, केवल उनके आभूषणों की ध्वनि उनके कानों में पड़ी है । इसका अभिप्राय यह है कि भक्ति की प्राप्ति के क्रम में श्रवण अनिवार्य है। भक्ति के प्रति जो अनुराग उत्पन्न होगा, उसके मूल में श्रवण ही होगा । श्रीसीताजी को पाने के संदर्भ में भगवान राम ने इसी क्रम का निर्वाह करके श्रवण के महत्व को प्रकट किया ।

No comments:

Post a Comment