Sunday, 13 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

अभिमान की परिभाषा क्या है ? जैसे अग्नि का स्वभाव है दाहकता, इसी तरह प्रकृति में जितने भी पदार्थ हैं, उन सबका अलग-थलग धर्म है । अभिमान के लिए कहा गया है -
        हरष विषाद ग्यान अग्याना ।
        जीव धर्म अहमिति अभिमाना ।।
अग्यान और अभिमान ही जीव का लक्षण तथा धर्म है । इसका अभिप्राय क्या है ? व्यक्ति के मन में कुछ ऐसे रोग हैं, जिनकी एक सीमा है, एक अवधि है । किसी कारण से वे उत्पन्न होते हैं और कुछ समय बाद दूर हो जाते हैं । उदाहरण के लिए काम को ही लें । काम व्यक्ति के जीवन में उत्पन्न होता है, पर कुछ समय बाद वह शान्त हो जाता है, कुछ समय बाद व्यक्ति उससे विरक्त भी हो जाता है । क्रोध भी चाहे कितना ही प्रचण्ड क्यों न हो ! कुछ काल बाद शान्त हो जाता है । लोभ के साथ अवश्य ही एक जटिल समस्या है, इसलिए गोस्वामीजी ने उसके साथ भी एक शब्द जोड़ दिया है - 'काम बात कफ लोभ अपारा'। लोभ के साथ अपार शब्द का प्रयोग किया गया । इसका अभिप्राय यह है कि काम की तो एक सीमा है, तृप्ति है, विराम है; क्रोध की भी एक सीमा है, परन्तु व्यक्ति के जीवन में लोभ की कोई सीमा नहीं है । इसलिए लोभ के साथ कहा गया - 'अपारा अर्थात जो असीम हो, लेकिन इतना होते हुए भी कोई कितना भी बड़ा लोभी क्यों न हो ? जब वह विश्राम करने जाता है, सोना चाहता है, तब तो वह लोभ की वृत्ति से अलग रहता है । लेकिन जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, जन्म के पूर्व एवं जन्म के बाद जीवन के प्रत्येक घटना के साथ जुड़ी हुई जो वस्तु है, वह क्या है ? यह अभिमान ही ऐसा विलक्षण है, जिसका परिचय रामायण में 'जीव का धर्म' कहकर दिया गया है ।

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