ब्रह्माजी के पाँच शिर थे । उनमें से एक को शंकरजी ने काट दिया, चार रहने दिया । नया शिर उन्होंने नहीं जोड़ा । बोले - आपको नये शिर की आवश्यकता नहीं है, ये चार ही पर्याप्त हैं । इसका तात्विक अभिप्राय क्या है ? ब्रह्मा को अपनी कृति के सौन्दर्य के प्रति आकर्षण का अनुभव हुआ और वे उनके पीछे भागे । तब भगवान शंकर ने तुरंत उनका शिर काट दिया । इसका अभिप्राय यह है कि जो सृजन करते हैं, उनमें सबसे बड़ा दोष यह होता है कि वे अपनी कृति के सौन्दर्य पर मोहित हो जाते हैं और उसके पीछे भागने लगते हैं । उनकी अपनी कृति के प्रति आसक्ति का केन्द्र यह पाँचवा शिर था । भगवान शंकर ने ब्रह्मा की इस आसक्ति बुद्धि को, इस पाँचवे शिर को काट दिया । बोले - सृजन के लिए ये चार शिर ही ठीक हैं, आसक्ति वाला शिर ठीक नहीं है । इसलिए अब तुम चार शिर वाले ही रहो ।
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