व्यक्ति के जीवन में ऐसा कोई क्षण नहीं है, जिसमें 'मैं' अविद्यमान हो । इसकी सबसे बड़ी कसौटी क्या है ? जब हम सो जाते हैं, तो साथ ही शरीर सो जाता है, सारी इन्द्रियाँ भी सो जाती हैं, लेकिन उस समय भी कोई एक ऐसा है, जो जागता रहता है । कौन ? वही जो कहता है कि अच्छी नींद लगी थी, खूब मजे से सोया । सोकर उठने के बाद हमारे मुख से यह जो शब्द निकलता है कि खुब चैन से सोया । इसे कौन अनुभव करता है ? कौन बोलता है ? मन, बुद्धि और चित्त भले ही न दिखाई देते हों, पर यह 'मैं' जो नींद के सुख को अनुभव कर रहा था, वह गहरी नींद में भी 'अहं' के रूप में जाग रहा था । इस तरह से यह अहं व्यक्ति के जीवन में जन्म से लेकर अन्तिम क्षण तक प्रत्येक क्रिया में शाश्वत रूप से जुड़ा हुआ है । इतना ही नहीं, इसकी विलक्षणता यह है कि यह पाप के साथ तो जुड़ा ही हुआ है, व्यक्ति के सत्कर्म और पुण्य के साथ भी जुड़ा हुआ है । यह अधर्म के साथ तो जुड़ा ही हुआ है, किन्तु धर्म के साथ भी जुड़ा है । अज्ञान के साथ तो जुड़ा ही है, पर ज्ञान के साथ भी यह 'अहं' जुड़ा हुआ है । इस प्रकार जो अहंकार जीवन में एक क्षण के लिए भी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ता, जो प्रत्येक वृत्ति के साथ व्यक्ति के अन्तःकरण में विद्यमान है, उस 'अहं' से मुक्त हो पाना कितना कठिन होगा, इस पर हम विचार करेंगे, विशेष रूप से जब एक साधक अपने अन्तर्जीवन को देखता है, तो उसे ऐसा प्रतीत होता है कि सचमुच ही इस अहं पर विजय पाना सर्वाधिक कठिन है । इसे रामायण में एक दूसरी शैली में भी प्रकट किया गया है, जिसकी चर्चा हम आने वाले दिनों में करेंगे ।
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