भक्ति की भाषा दूसरी है । उसमें सब 'तू' ही 'तू' है । तुझे छोड़कर और कुछ है ही नहीं । इसे यूँ कह सकते हैं कि चाहे 'मैं' मिट जाय या फिर 'तू' मिट जाय, परन्तु द्वैत को मिटना ही चाहिए । 'तू' मिटकर अगर केवल 'मैं' रह जाय, व्यक्ति को सारा ब्रह्मांड, सर्वत्र अपना ही स्वरूप दिखाई देने लगे अथवा 'मैं' मिटकर केवल 'तू' ही 'तू' रह जाय और सर्वत्र उसे ईश्वर ही दिखाई देने लगे, सेवाभाव का उदय हो जाय, तो फिर कौन किसका विरोध करेगा ? कौन किससे ईर्ष्या, किससे कपट करेगा ? जिन दुर्गुण-दुर्विचारों की चर्चा पिछले दिनों चलती रही है, उसका मूल कारण क्या है ? मनुष्य के मन में जो भेदबुद्धि है, उसके ही कारण तो ये उत्पन्न होते और पनपते हैं । 'मैं' यदि सचमुच इतना व्यापक हो जाय कि वह सारे ब्रह्मांड को अपने में समेट ले, कोई पराया ही न रह जाए, तब तो विरोध करने की वृत्ति ही नहीं रह जायेगी । यही 'अहं' शिव का वास्तविक स्वरूप है, लेकिन उनके इस स्वरूप को न जानकर, जो अपने क्षुद्र 'अहं' से उनकी तुलना करते हैं, उन्हें एक खण्ड 'अहं' के रूप में देखते हैं तथा उसी कसौटी के आधार पर विचार करते हैं, वे अपने क्षुद्र अहं को ही शिव पर आरोपित करते हैं ।
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