पुष्पवाटिका प्रसंग में श्रीसीताजी के द्वारा पार्वतीजी का जो पूजन है, वह श्रद्धा का पूजन है । इस प्रसंग में दोनों क्रम साथ-साथ चल रहे हैं । अगर ज्ञान पाना हो तो पहले श्रद्धा का आश्रय लें और भक्ति पाना हो तो पहले संत का आश्रय लें । यहाँ संयोगवश इन दोनों क्रम का मिलन हो जाता है । यह प्रसंग दोनों का समुच्चय है । भगवान राम के जीवन में भक्ति की उपलब्धि और श्रीसीताजी के जीवन में ज्ञान की उपलब्धि के क्रम का यहाँ पर बड़ा सांकेतिक वर्णन है ।
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