Friday, 4 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

श्रवण का यह क्रम ज्ञान के संदर्भ में भी है । सीताजी भगवान राम को किस क्रम से पाती हैं ? यहाँ भी वही क्रम है । ऐसा नहीं है कि श्रीसीताजी पुष्पवाटिका में गयीं और वहाँ उन्होंने श्रीराम को देख लिया । उन्होंने देखा नहीं, बल्कि पहले सुना । उनकी एक सखी बाग में फूल चुनने गयी थी और वहाँ उसने अचानक श्रीराम को देख लिया । लौटकर उसने श्रीसीताजी के समक्ष श्रीराम के सौन्दर्य का वर्णन किया । यहाँ पर भी वही सूत्र है । ज्ञान के संदर्भ में भी श्रुति की प्रधानता है । तात्पर्य यह है कि ज्ञान के भी दो रूप हैं - एक है परोक्ष ज्ञान और दूसरा अपरोक्ष ज्ञान । पहले सुनकर परोक्ष ज्ञान होता है और उसके बाद अनुभव के द्वारा अपरोक्ष ज्ञान होता है । भक्ति और ज्ञान, दोनों के संदर्भ में श्रवण का यह महत्व और क्रम समान है । सीताजी को पाने की दिशा में भी भगवान राम पहले देखते नहीं, सुनते हैं और भगवान राम को पाने की दिशा में भी सीताजी भगवान राम को पहले देखतीं नहीं, अपितु उनके बारे में सुनती हैं । और सुना भी तो किस पद्धति से ? ज्ञान की जो अनिर्वचनीयता है, उसी क्रम में - कैसे वर्णन करती हैं ? कहती हैं -
      स्याम गौर किमी कहौं बखानी ।
      गिरा अनयन नयन बिनु बानी ।।
जो देख रहा है वह बोल नहीं पाता और जो बोल रहा है वह देख नहीं पाता । यह ब्रह्म की, ज्ञान की अनिर्वचनीयता है । तात्पर्य यह है कि वह वाणी का नहीं, बल्कि अनुभूति का विषय है । सखी ही वह आचार्य है, जिसने परोक्ष ज्ञान के रूप में सीताजी के समक्ष ज्ञान की अनिर्वचनीयता का प्रतिपादन किया ।

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