गणेशजी के प्रसंग में भी देखें । पार्वतीजी ने स्नान करते समय गणेशजी का निर्माण कर दिया । यह बड़ी सांकेतिक भाषा है । गणेशजी का निर्माण अकेली पार्वतीजी ने ही कर दिया । गणेशजी ने पूछा - माँ ! क्या आज्ञा है ? तो पार्वतीजी ने कहा - तुम पहरे पर खड़े रहो, कोई अन्दर न आने पावे । गणेशजी दरवाजे पर खड़े हो गए । संयोग से शंकरजी ही आ गये और भीतर जाने लगे । गणेशजी शंकरजी को पहचानते नहीं थे, उन्होंने तुरंत उनको रोक दिया । शंकरजी ने कहा - क्या तुम मुझे पहचानते हो ? उन्होंने कहा - न पहचानता हूँ और न इसकी आवश्यकता ही है; मैं तो माँ की आज्ञा का पालन करूँगा । केवल शब्द को पकड़ लिया गणेशजी ने । कभी-कभी विद्वान लोग शब्द को बड़ा महत्व देते हैं । गणेशजी ने कहा - माँ ने कहा है कि किसी को भीतर न आने देना । अब किसी को भीतर न आने देने का अर्थ यह तो नहीं है कि गृहस्वामी को ही रोक दें । शंकरजी ने उनका शिर काट दिया और भीतर चले गए । पार्वतीजी ने पूछा - महाराज ! उस बालक ने आपको द्वार पर रोका तो नहीं ? बोले - रोका तो था । फिर आपने क्या किया ? बोले - मैंने उसका शिर काट दिया ।
......आगे कल .......
......आगे कल .......
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