भगवान शंकर के चरित्र में शिर काटने का प्रसंग बार-बार आता है । ब्रह्मा के पाँच शिर थे, उनका एक शिर काट दिया था । शंकरजी के श्वसुर दक्ष का शिर भी भगवान शंकर की ही प्रेरणा से कट गया और अपने पुत्र गणेश का शिर भी स्वयं उन्होंने काट लिया था । इसका अभिप्राय यह है कि शंकरजी तो हैं विश्वास के देवता और यह शिर ही है, जो विश्वास के विरूद्ध बार-बार विद्रोह करता है । इसलिए वे शिर को ही पहले काटते हैं । शिर माने क्या ? शिर बुद्धि का स्थान है । अब प्रश्न उठता है कि क्या विश्वास को बुद्धि की आवश्यकता नहीं है ? बुद्धि में दो प्रकार की वृत्ति है, संशय की वृत्ति और विवेक की वृत्ति । जहाँ पर संशय की वृत्ति है, वहाँ पर वे शिर काट देते हैं और विवेक वृत्ति का एक नया शिर जोड़ देते हैं ।
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