Tuesday, 22 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

शिव हैं समष्टि अहंकार । इस तत्व को ठीक-ठीक न समझ पाने के कारण ही शिव के स्वरूप के बारे में भ्रांतिपूर्ण धारणा बन जाती है । शिव में द्वैत नहीं है, राग नहीं है । रावण भी शंकर का पुजारी है । किन्तु वह भगवान शिव के इस स्वरूप को किस दृष्टि से देखता है, क्या अर्थ लेता है ? रावण की धारणा है कि शिव जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और जो भी माँगो, वही वर दे देते हैं । यह तो रावण की बुद्धि है, पर शंकरजी क्या कहते हैं ? - मेरे पास कमी नहीं है, थोड़ा मत माँगना । इसका अभिप्राय क्या है ? बेचारे जो दरिद्र वृत्तिवाले हैं, उनको लगता होगा कि हजार रूपये कम हैं, तो लाख माँग लें । इसे ही वही बहुत समझता है । अरे भाई ! रामायण में तो यहाँ तक कहा गया है कि स्वर्ग माँगना भी थोड़ा है । भगवान शिव का तात्पर्य है कि मुझे पाने के बाद भी अगर कोई भगवत्-तत्व को पा ले तो यही पाने की सार्थकता है किन्तु मुझे पाने के बाद भी अगर कोई वह पाने से वंचित रह गया, तो इससे बढ़कर दुर्भाग्य भला और क्या होगा ? मुझे पाकर भी अगर कोई ऐसी वस्तुओं की माँग कर बैठे, जो अनित्य है, जिसे कोई भी अपने ही प्रयास से या अन्य उपायों से पा सकता है तथा जिसे पाने के साथ खोना भी अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है, ऐसी वस्तु मुझसे माँगने में क्या सार्थकता है ?

No comments:

Post a Comment