गोस्वामीजी कहते हैं कि वैसे तो ईश्वर की ईच्छा मात्र से काल भी मर सकता है, फिर भी वे देखना चाहते हैं कि जीव इसमें कितना सहयोग देता है । इसलिए श्रीराघवेन्द्र विभीषण की ओर देखते हैं और विभीषणजी उस रहस्य को जानते हैं कि रावण की मृत्यु क्यों नहीं हो रही है ? उसके नए सिर और नई भुजाएँ क्यों निकल रही हैं ? गोस्वामीजी द्वारा प्रदत्त सूत्र बड़े महत्व का है । काकभुशुण्डिजी कहते हैं -
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
अब इनको चाहे मानस-रोगों के संदर्भ में औषध कह लीजिए, चाहे लंका के राक्षसों के संदर्भ में बाण । यदि मोह राक्षस है, तो बाण चलाया जाता है और यदि मोह रोगों का मूल है, तो औषध दी जाती है । लेकिन मोह ऐसा है कि बहुत-सी औषधियों का प्रयोग करने पर भी मनुष्य के दुर्गुणों का विनाश नहीं होता है । वैसे तो साधारणतः यदि किसी के शरीर पर प्रहार किया जाय या उसका सिर काट दिया जाय, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी । पर रावण के साथ समस्या है कि सिर और भुजा के साथ-साथ जब तक उसकी नाभि पर भी प्रहार नहीं किया जाएगा, वह नहीं मरेगा । यह नाभि वस्तुतः चित्त का मूल-केन्द्र है । यहीं पर पूर्व-पूर्व जन्मों के संस्कार संग्रहित रहते हैं ।
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
अब इनको चाहे मानस-रोगों के संदर्भ में औषध कह लीजिए, चाहे लंका के राक्षसों के संदर्भ में बाण । यदि मोह राक्षस है, तो बाण चलाया जाता है और यदि मोह रोगों का मूल है, तो औषध दी जाती है । लेकिन मोह ऐसा है कि बहुत-सी औषधियों का प्रयोग करने पर भी मनुष्य के दुर्गुणों का विनाश नहीं होता है । वैसे तो साधारणतः यदि किसी के शरीर पर प्रहार किया जाय या उसका सिर काट दिया जाय, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी । पर रावण के साथ समस्या है कि सिर और भुजा के साथ-साथ जब तक उसकी नाभि पर भी प्रहार नहीं किया जाएगा, वह नहीं मरेगा । यह नाभि वस्तुतः चित्त का मूल-केन्द्र है । यहीं पर पूर्व-पूर्व जन्मों के संस्कार संग्रहित रहते हैं ।
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