रामायण में दोनों प्रकार के क्रोध आपको दिखाई देंगे । कुछ पात्र ऐसे हैं, जिनके जीवन में क्रोध सन्तुलित है । वह उस आग के समान है, जिसे घर में भोजन पकाने के बाद बुझा दिया जाता है । पर कुछ दूसरे पात्र भी हैं, जो क्रोध में इतना उन्मत्त हो जाते हैं कि उनका क्रोध ज्वाला बनकर उन्हें जलाने लगता है । पहले प्रकार का क्रोध भगवान राम और लक्ष्मणजी के चरित्र में दिखाई देता है और दूसरे प्रकार का क्रोध नारद, परशुराम और कैकेयी के जीवन में दृष्टिगोचर होता है । जहाँ पर 'क्रोध पित्त नित छाती जारा' वाली बात चरितार्थ होती है । यहाँ पर इस सन्दर्भ में मैं एक संकेत यह कर दूँ कि क्रोध स्वयं क्रिया न होकर एक प्रतिक्रिया है । काम और लोभ तो क्रिया हैं, पर क्रोध प्रतिक्रिया है । इसका अभिप्राय यह है कि क्रोध अपने आप जन्म नहीं लेता - वह काम, लोभ और अहंकार की वृत्ति में बाधा पड़ने से प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट होता है । यदि व्यक्ति के जीवन में काम की पूर्ति में बाधा पड़े तो क्रोध आ जाएगा, या लोभी व्यक्ति के जीवन में लोभ की पूर्ति में बाधा पड़े तो वह क्रोध का शिकार होगा, या फिर अहंकारी व्यक्ति के अहंकार पर चोट लगे तो क्रोध जन्म लेगा । तात्पर्य यह है कि क्रोध जीवन में प्रतिक्रिया के रूप में आता है तथा वह अन्य अवगुणों के साथ जुड़ा हुआ आता है ।
No comments:
Post a Comment