Wednesday, 18 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

कल मानस-रोगों से मुक्ति के संदर्भ की बात रखी गई, पर पहले मानस-रोगों का जो विचित्र रूप है, उस पर थोड़ा विचार करें । एक रोगी केवल अपने लिए ही समस्या नहीं होता, वह दूसरों के लिए भी समस्या खड़ी करता है । रोगी स्वयं तो अस्वस्थ होता ही है, दुख पाता ही है, साथ ही परिवार के लोगों को भी चिन्ता में डाल देता है । और कहीं रोग यदि छूतवाला हुआ, तब तो वह केवल चिंता ही नहीं, रोग भी बाँटता है । शरीर के संदर्भ में तो कुछ ही रोग ऐसे होते हैं, जो छूत से होते हैं और शेष रोग छूतजन्य नहीं होते, लेकिन मानस-रोगों के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि सारे-के-सारे रोग छूत से फैलते हैं । जो व्यक्ति मन से रोगी होता है, वह परिवार को और समाज को भी रोगी बना देता है । इसलिए मन के रोग के स्वरूप को समझकर उसे मूल से नष्ट करने की चेष्टा करनी चाहिए ।

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