Sunday, 8 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

वैसे स्वभावतः नारद बड़े सत्यवादी हैं ; यदि उनसे कोई पूछे कि सबसे बड़ा पाप क्या है, तो वे यही कहेंगे कि असत्य से बढ़कर कोई पाप नहीं है । पर आज नारद मोह में पड़ गए हैं, इसलिए जानते हुए भी सत्य को दबा जाते हैं । गोस्वामीजी लिखते हैं - मुनि ने विश्वमोहिनी के सब लक्षणों को विचारकर मन में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिए । उन्हें लगा कि यदि मैं यह सच-सच बता दूँ, तो ये कहीं अपनी कन्या का विवाह किसी दूसरे से न कर दें; इसलिए मैं ही योजना बनाकर उसे प्राप्त कर लूँ । उसके पश्चात नारद के जीवन में सारे दुर्गुण - काम, क्रोध, लोभ, मद और मात्सर्य - दिखाई देने लगे, जिन सबके मूल में रामायण के अनुसार - उनका यही अपार मोह है ।

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