कल के प्रसंग को सूत्र के रूप में यों कहें कि योग्य से योग्य वैद्य भी रोगी को तब तक स्वस्थ नहीं कर सकता, जब तक कि रोगी स्वयं वैद्य को सहयोग न दे । यदि रोगी वैद्य के आदेश का पालन करे, वैद्य की दी हुई औषध और पथ्य का सेवन करे, तभी वह स्वस्थ हो सकता है । पर यदि वैद्यराज ऊँची से ऊँची दवा देकर, पथ्य बताकर चले जाएँ और रोगी उस पुड़िया को फेंक दे तथा जिन वस्तुओं को वैद्य ने खाने के लिए मना किया हो उन्हें खाने की चेष्टा करे, तब वैद्य की उच्च से उच्च योग्यता भी उस रोगी को भला कैसे स्वस्थ कर सकती है ? इसी प्रकार ईश्वर चाहे जितने बड़े वैद्य हों, पर जब तक रोगी के रूप में यह जीव उनको सहयोग नहीं देगा, तब तक उनकी सर्वशक्तिमता सफल नहीं हो सकती । यहाँ पर भी यही संकेत है । विभीषण स्वयं जीव के प्रतीक हैं ।
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