Tuesday, 17 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

मोह की सबसे बड़ी विलक्षणता यह है कि अन्य रोग तो मन में होते हैं, पर मोह का निवास चित्त में होता है । इसलिए मन की औषधि करने पर भी चित्तगत दोषों का नाश नहीं होता है । अतएव चित्तगत दोषों को मिटाने के लिए वैराग्य का अभ्यास औषधि के रूप में दिग्दर्शित हुआ है । काकभुशुण्डिजी कहते हैं - मन को तब निरोग हुआ जानना चाहिए, जब ह्रदय में वैराग्य का बल बढ़ जाए । तात्पर्य यह है कि चित्तगत, संस्कारगत मोह को काटने के लिए तीव्र वैराग्य के अभ्यास की आवश्यकता होती है । इसलिए महापुरूष लोग साधनाक्रम में अभ्यास पर बल देते हैं । पुराने प्रतिकूल संस्कारों को काटने के लिए अभ्यास के द्वारा चित्त में नए अनुकूल संस्कार पैदा करने होते हैं । पुराने संस्कारों को काटने के लिए रामचरितमानस में सूत्र दिया गया है - सत्संग से, बार-बार सन्त का संग करने से वैराग्य और भक्ति के संस्कार तीव्र होते हैं और पुराने संस्कार समाप्त होते हैं । मानस-रोगों से मुक्ति पाने का यही उपाय है ।

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