गोस्वामीजी आयुर्वेद की पध्दति से मन के रोगों को समझाते हैं । आयुर्वेदशास्त्र कहता है कि इस शरीर की रचना में कफ, वात और पित्त इन तीन धातुओं का महत्व है, जो व्यक्ति को चैतन्य बनाए रखते हैं । जब तक ये सन्तुलित रूप से विद्यमान रहते हैं, तब तक तो व्यक्ति स्वस्थता का अनुभव करता है, पर ज्योंही इनमें असंतुलन उत्पन्न होता है, वह अस्वस्थ हो जाता है । इसी प्रकार मन में भी काम, क्रोध और लोभ रूप वात, पित्त और कफ हैं । विगत दिनों काम और लोभ की चर्चा की गयी थी । अब हम थोड़ा क्रोध के संदर्भ में विचार करेंगे । यदि हम शरीर को देखें तो वात और कफ की भूमिका के साथ पित्त की भूमिका भी बड़े महत्व की है । यदि व्यक्ति के शरीर में पित्त सर्वथा समाप्त हो जाए, तो पाचन प्रक्रिया नष्ट हो जाएगी । यह पित्त पाचन की प्रक्रिया को सक्रिय करता है ।
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