सृष्टि के सृजन की प्रक्रिया में नाभि को बड़ा महत्व दिया गया है । कहा जाता है कि सृष्टि का सृजन ब्रह्मा द्वारा होता है और ब्रह्मा का जन्म कमल पर, जो भगवान विष्णु की नाभि से निकलता है । तो, कमल से ब्रह्मा और ब्रह्मा से सृष्टि । इसका क्या तात्पर्य हुआ ? यही कि सृष्टि करते समय ब्रह्मा मनमानी नहीं करते, किसी को सुन्दर या किसी को कुरूप नहीं बनाते, अपनी ओर से सृष्टि में भेद उत्पन्न नहीं करते, अपितु भेद के बीज कमल में ही रहते हैं, जिसमें से उनकी भी उत्पत्ति हुई है । सृष्टितत्व में बताया गया है कि प्रयलकाल में यह विराट् ब्रह्माण्ड भगवान के उदर में सो जाता है । वस्तुओं के स्थूल रूप तो मिट जाते हैं, पर वे संस्कार के रूप में ईश्वर के उदर में समाहित रहते हैं । जब तक ईश्वर सुषुप्त हैं, निष्क्रिय हैं, तब तक वे संस्कार भी सुप्त रहते हैं, दिखाई नहीं देते । जैसे हमारे जीवन में होता है । जब हम गहरी नींद में होते हैं, उस समय हमारे अभ्यासजन्य संस्कार सक्रिय नहीं दिखाई देते । लेकिन जैसे ही नींद खुलती है, वे सक्रिय हो जाते हैं । इसी प्रकार से जब प्रलय होता है तो व्यक्ति केवल संस्कार के रूप में जीवित रहता है, वह ईश्वर के उदर में समाया रहता है । सृष्टिकाल में उस नाभि से, संस्कारों के उस मूल-केन्द्र से सृष्टि की प्रक्रिया प्रारंभ होती है । इस प्रसंग में कहा गया है कि रावण की नाभि में अमृतकुण्ड है । तात्पर्य यह है कि रावण की नाभि में पूर्व-पूर्व जन्मों के चित्तगत संस्कार पड़े हुए हैं ।
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