गोस्वामीजी विनयपत्रिका में लिखते हैं - विभीषण जीव हैं और रावण मूर्तिमान मोह है । जब चेष्टा करने पर भी मोह नष्ट नहीं होता, तब भगवान श्रीराघवेन्द्र जीव से सहायता की याचना करते हैं । वे विभीषण से पूछते हैं - क्यों ? बहुत से ऐसे विषय होते हैं, जिनमें वैद्य को रोगी से बड़ी प्रेरणा मिलती है । रोगी को अपनी प्रकृति के, अपने स्वयं के विषय में जितनी अनुभूति होती है, उतनी वैद्य को नहीं है । अतः जब रोगी अपनी पूरी प्रकृति, अपनी समस्त समस्याओं को वैद्य के सामने रखता है, तभी वैद्य ठीक-ठीक दवाओं की व्यवस्था कर उनकी समस्याओं का समाधान करने में समर्थ होता है । तो, भगवान श्रीराघवेन्द्र विभीषण की ओर देखते हैं, तो इसका तात्पर्य यह है कि रोगों का विनाश तब तक नहीं होगा, जब तक जीव स्वयं सहायक नहीं बनेगा, जब तक वह स्वयं मोह को नहीं मिटाना चाहेगा ।
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