भगवान ने नारद को बता दिया कि तुम वृथा गर्व कर रहे हो कि तुमने काम को जीत लिया, देखो तुम तो काम में इतने पागल हो रहे हो, जितना एक गृहस्थ भी नहीं होता ! गृहस्थ कामी भी बनता है तो सुबह उठकर पूजा-पाठ तो कर ही लेता है, पर नारद की दशा ऐसी हो गयी है कि कहते हैं -
जप तप कछु न होइ तेही काला ।
हे विधि मिलइ कबन विधि बाला ।।
नारद को बड़ा गर्व था कि मुझे अभिमान नहीं हुआ । पर भगवान ने उन्हें दिखा दिया कि तुम कितने अभिमानी हो ! अरे, तुम तो मुझ पर क्रोध कर रहे हो, मुझे गाली दे रहे हो, मुझे शाप दे रहे हो ! तुम्हारा सारा अभिमान व्यर्थ है । नारद जब इस सत्य को समझ लेते हैं, तब भगवान उनके अलग-अलग विकारों को दूर करने के बदले विकारों के मूल में जो मोह की वृत्ति विद्यमान है; उसी को दूर कर देते हैं । और जब विश्वमोहिनी नहीं रही - जब तक माया थी, तब तक भगवान से झगड़ रहे थे और जब माया का लोप हो गया, मोह दूर हो गया, तो भगवान के श्री चरणों में गिर पड़े और कहने लगे - महाराज, मेरा पाप कैसे मिटे यह बताइए । मुझसे जो दोष हुआ है, उसका प्रायश्चित क्या है ? भगवान विष्णु ने मुस्कराकर कहा - जाकर शंकरजी के शतनाम का जप करो । उन्होंने मुनि को शंकरजी की याद दिला दी । प्रभु का संकेत यह है कि मुनि, यदि तुमने शंकरजी की बात सुनी होती, तो समस्या ही नहीं आती ।
जप तप कछु न होइ तेही काला ।
हे विधि मिलइ कबन विधि बाला ।।
नारद को बड़ा गर्व था कि मुझे अभिमान नहीं हुआ । पर भगवान ने उन्हें दिखा दिया कि तुम कितने अभिमानी हो ! अरे, तुम तो मुझ पर क्रोध कर रहे हो, मुझे गाली दे रहे हो, मुझे शाप दे रहे हो ! तुम्हारा सारा अभिमान व्यर्थ है । नारद जब इस सत्य को समझ लेते हैं, तब भगवान उनके अलग-अलग विकारों को दूर करने के बदले विकारों के मूल में जो मोह की वृत्ति विद्यमान है; उसी को दूर कर देते हैं । और जब विश्वमोहिनी नहीं रही - जब तक माया थी, तब तक भगवान से झगड़ रहे थे और जब माया का लोप हो गया, मोह दूर हो गया, तो भगवान के श्री चरणों में गिर पड़े और कहने लगे - महाराज, मेरा पाप कैसे मिटे यह बताइए । मुझसे जो दोष हुआ है, उसका प्रायश्चित क्या है ? भगवान विष्णु ने मुस्कराकर कहा - जाकर शंकरजी के शतनाम का जप करो । उन्होंने मुनि को शंकरजी की याद दिला दी । प्रभु का संकेत यह है कि मुनि, यदि तुमने शंकरजी की बात सुनी होती, तो समस्या ही नहीं आती ।
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