Monday, 30 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

....कल से आगे .....
मन की दो स्थितियाँ हैं - एक, जल की तरह और दूसरी, दर्पण की तरह । जल में भी आकृति दिखाई देती है । एक क्षण के लिए जल शान्त-सा प्रतीत होता है, झाँकने लगिए तो आकृति दिखाई पड़ती है, पर एक कंकड़ी भी अगर गिर जाए, हवा का तनिक झोंका चल जाय तो जल हिलने लगता है । और तब उसमें आकृति सही दिखाई नहीं देती । इसी प्रकार जब वासना के कंकड़ से मन अशान्त और चंचल हो गया हो, तब उस अशांत मन के द्वारा यदि व्यक्ति आत्म-निरिक्षण करे, तो वह अपनी वास्तविकता को नहीं देख पाता है । नारदजी की स्थिति ऐसी ही थी, उन्हें एकान्त में शीशे में अपना मुँह देखने को नहीं मिला, उन्होंने जल में अपने मुख को देखा । अभिप्राय यह है कि चंचल मन से उन्होंने अपनी ओर देखने की चेष्टा की । फलस्वरूप 'कामात्क्रोधोSभिजायते' वाली बात उनके जीवन में आ गई । नारदजी को यह संकोच तो हुआ नहीं कि मैं बन्दर क्यों बन गया ? उन्हें तो इस बात पर क्रोध आ गया कि दूसरों ने मुझे बन्दर क्यों कह दिया ? और क्रोध में आकर उनके मुँह से पहली बात निकली - तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ । तुमने हमारी हँसी की, उसका फल भोगो ।

No comments:

Post a Comment