Friday, 20 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

मनुष्य का मन काम, क्रोध और लोभ से परिचालित होता है । यदि व्यक्ति के मन में काम न हो, तो यह आशंका बन सकती है कि व्यक्ति कहीं निष्क्रिय न हो जाए । यदि लोभ के माध्यम से समाज में धन संग्रहित न हो, तो परिणाम यह होगा कि समाज निर्धन हो जाएगा । दरिद्रता के विनाश के लिए या अन्य मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए जिस धन की आवश्यकता है, उसकी पूर्ति लोभ के द्वारा होती है । इस प्रकार काम और लोभ के द्वारा समाज में सृष्टि का और उसे गतिशील बनाने का कार्य सम्पन्न होता है । इनके साथ क्रोध के रूप में यह जो पित्त है, उसका भी अपना मौलिक महत्व है । उसके अभाव में भोजन ज्यों का त्यों बना रहेगा, जिससे शरीर शक्तिशाली नहीं बन पाएगा । पित्त अग्नि के रूप में भोजन को जलाकर ऐसी ईंधनशक्ति के रूप में परिणत कर देता है, जिससे शरीर को अपने संचालन के लिए आवश्यक रसों की प्राप्ति होती है । पर जब यही पित्त शरीर में अधिक बनने लगता है, तो वह अन्न को भस्मीभूत करने के स्थान पर व्यक्ति के ह्रदय को ही जलाने लगता है । क्रोध की प्रक्रिया भी ठीक ऐसी ही है । वैसे काम और लोभ की तुलना में क्रोध की विचित्रता पर लोगों का ध्यान कम जाता है । क्रोध के प्रति हमारी सजगता की वृत्ति उतनी नहीं होती, तथापि जीवन में व्यक्ति जिसका प्रतिक्षण अनुभव करता है, वह क्रोध है ।

No comments:

Post a Comment