रामायण में एक बढ़िया उपमा दी गयी है । भगवान राम काम की तुलना तो सर्प से करते हैं और क्रोध की अग्नि से । यह प्रसंग अरण्यकाण्ड में आता है । यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि व्यक्ति सर्प से जितना डरता है, आग से उतना नहीं डरता, क्योंकि उसे लगता है कि सर्प न जाने कब अँधेरे में से निकलकर उसे डस ले । आग तो छिपी नहीं है, वह प्रत्यक्ष है । घर में नित्य उसका प्रयोग होता है, इसलिए अग्नि को हम निकट से देखने के इतने अभ्यस्त हैं कि उससे सर्प के समान भय नहीं लगता । पर सच्चाई तो यह है कि अग्नि भी सर्प के समान घातक है । जैसे सर्प के डँसने से कितने लोगों की मृत्यु होती है, वैसे ही अग्नि से जल जाने से भी, किन्तु दोनों में अन्तर यह है कि एक अँधेरे में छिपा हुआ है तो दूसरा प्रत्यक्ष है । इसी प्रकार काम की वृत्ति छिपी रहती है, जबकि क्रोध प्रकट । इस काम की वृत्ति को व्यक्ति प्रकट नहीं करना चाहता, लेकिन क्रोध करने में वह संकोच नहीं करता । भगवान श्रीराघवेन्द्र कहते हैं कि दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है, बल्कि सर्प से तो हमें कभी-कभी ही भय होगा, किन्तु अग्नि से हमें नित्य भय है । सर्प के निकलने की संभावना तो ऋतु-विशेष में, स्धान-विशेष में होती है, पर अग्नि का जलना तो सब जगह, सब समय नितांत आवश्यक है । ऐसी परिस्थिति में अग्नि के प्रति व्यक्ति को सतत् सजग रहना चाहिए ।
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