Thursday, 12 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

गोस्वामीजी विनयपत्रिका में रावण को मूर्तिमान मोह बताते हैं । गोस्वामीजी के इस कथन का एक आध्यात्मिक तात्पर्य है । भगवान श्रीराघवेन्द्र रावण के दस सिर और बीस भुजाओं को अपने तीस बाणों के द्वारा काट देते हैं, पर अगले ही क्षण अद्भुत दृश्य दिखाई देता है, वह यह कि रावण के नए सिर और नई भुजाएँ निकल आती हैं । श्रीराम बारम्बार उसके सिर और भुजाओं को काटते हैं और उतनी ही बार रावण के नए सिर और भुजाएँ पैदा हो जाती हैं । इस प्रकार रावण को मारने की चेष्टा करने पर भी जब भगवान श्रीराघवेन्द्र उसका वध नहीं कर पाते - कम-से-कम लोगों के सामने तो यही दिखाई देता है - तब वे विभीषण की ओर देखते हैं । इस प्रसंग को जब शंकरजी ने पार्वतीजी को सुनाया, तो उन्हें यह सोच बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान ईश्वर रावण का वध नहीं कर सकते थे ? पर यह प्रसंग मात्र उसी प्रसंग के संदर्भ में नहीं है, अपितु वह तो हम सबके जीवन से जुड़ा हुआ है । जब यह कहा जाता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं और व्यक्ति के ह्रदय में बैठे हुए हैं, तो ऐसी स्थिति में प्रश्न यह उठता है कि वे जीवन की बुराइयों को मिटा क्यों नहीं पा रहे हैं ? ईश्वर के होते हुए भी हमारे अन्दर दुर्गुण ज्यों के त्यों क्यों बने हुए हैं ? रावण के उक्त प्रसंग में इस प्रसंग का सार्थक उत्तर दिया गया है ।

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