Wednesday, 11 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

काकभुशुण्डिजी ने रोगों का मूल कारण मोह को बताया । जाने हुए सत्य की उपेक्षा करने की जो वृत्ति है, वह मोह है और यह मोह अभ्यास से उत्पन्न हुआ है, जो केवल इसी जन्म से सम्बध्द नहीं है, अपितु अगणित पूर्व-पूर्व जन्मों से बनता चला आया है । जैसे कई बार कुछ लोगों का अभ्यास बन जाता है मुँह में उँगली डालकर चबाने का । वे यह जानते तो हैं कि ऐसा करना ठीक नहीं, लेकिन जब भी वे कुछ सोचते रहते हैं, तो अनजाने में, बिना प्रयास के, उनका अभ्यास उन पर हावी हो जाता है और अभ्यास से प्रेरित हो वही कार्य करने लगते हैं, जिन्हें वे बुरा समझते हैं । जब व्यक्ति के इसी जीवन में पड़ने वाले दुर्गुण के अभ्यास का छूटना इतना कठिन होता है, तब अगणित जन्मों से जो अभ्यास बना चला आ रहा है, उनका छूटना कितना कठिन होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है । ये अभ्यास संस्कार के रूप में चित्त में संग्रहित रहते हैं, इसलिए अनुकूल परिस्थिति पाने से अंकुरित होते रहते हैं । रावण के प्रसंग में इसी का संकेत किया गया है ।

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