विगत कुछ दिनों से चल रहे इस प्रसंग का नाम गोस्वामीजी 'नारद-मोह' देते हैं । यह सार्थक नाम है । इसका तात्पर्य यह है कि दुर्गुणों के बीज व्यक्ति के अन्तःकरण में विद्यमान रहते हैं और समय पाकर वे अंकुरित हो उठते हैं । रामायण में यह दावा किया गया है कि बड़े से बड़ा व्यक्ति भी इसका अपवाद नहीं है, ऐसा कोई नहीं है जो कह सके कि उसके अन्तःकरण में दुर्गुणों के संस्कार नहीं है । यदि कोई ऐसा कहता है, तो वह अपने जाने हुए सत्य का तिरस्कार करता है और फलस्वरूप मन और शरीर की दृष्टि से अस्वस्थ हो उठता है । इसलिए रामचरितमानस में सारे रोगों के मूल में मोह का होना बताया गया है । मोह कोई रोग नहीं है, पर रोगों का जन्मदाता है ।
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