Wednesday, 25 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रामायण में विभिन्न पात्रों के संदर्भ में क्रोध का विश्लेषण किया गया है कि मनुष्य के जीवन में क्रोध कैसे आता है । काम की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न होनेवाले क्रोध का साक्षात्कार आपको नारद के चरित्र में मिलेगा । एक सज्जन ने मुझसे कहा - गीता में कहा गया है कि जब व्यक्ति विषय का चिन्तन करता है तो उससे संग उत्पन्न होता है, संग से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है । यहाँ नारद के जीवन में काम और क्रोध तो दिखाई दे रहे हैं, पर उन्होंने जीवन में संग या तो शंकरजी का किया या ब्रह्मा का या फिर विष्णु का । फिर इनके जीवन में काम कैसे आ गया ? बात यह है कि शरीर से संग तो उन्होंने ब्रह्मा-विष्णु-शंकर का किया, पर जहाँ भी जाते थे, वहाँ अप्सराओं की ही कथा सुनाते थे । वे भले ही शरीर से अप्सराओं को छोड़कर चले आए थे, पर उनके मन में तो उनके सौंदर्य का चिन्तन प्रतिक्षण हो रहा था । और विचित्र बात यह है कि जिस काम को उन्होंने हराकर भेज दिया था, उसी का वे अनवरत चिन्तन करने लगे थे । तो, संग का तात्पर्य केवल शरीर से संग नहीं होता, अपितु मनुष्य के अन्तर्मन में जिस वस्तु का चिन्तन चलता है, वही सच्चा संग होता है ।

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