Sunday, 29 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

विश्वमोहिनी ने भगवान के गले में जयमाल पहना दी तथा दोनों चले गए, तब दोनों रुद्रगणों ने नई भूमिका की । उन्होंने देवर्षि नारद से कहा - जाकर दर्पण में अपना मूँह तो देखिए । अब वे लोग यही सलाह पहले भी दे सकते थे । पर वह नहीं किया । जब नारद की पूरी दुर्दशा हो गयी और वे बेचारे व्याकुल हो गए, तब उन दोनों ने उन्हें अपना मुँह शीशे में जाकर देखने की बात कही । नारदजी तुरन्त वहाँ से उठे और जल में झाँककर अपना मुँह देखा । तुलसीदासजी कहते हैं - बुध्दि आँख है और मन शीशा - हम विवेक की दृष्टि से अपने मन के दर्पण में झाँककर वास्तविकता को देखने की चेष्टा करें । लेकिन मन को दर्पण तब कहा जाएगा, जब वह दर्पण की तरह रहे । मन की दो स्थितियाँ हैं - एक, जल की तरह और दूसरी, दर्पण की तरह ।
     ......आगे कल .....

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