एक सज्जन ने मुझे बतलाया कि एक महात्मा ने क्रोध को जीतने के उपाय लिखे हैं । उसमें सुझाया गया है कि क्रोध आने पर व्यक्ति अपने सामने शीशा रख ले और देखें कि क्रोध में शक्ल कैसी हो जाती है, तो क्रोध शान्त हो जाएगा । या फिर पानी पी ले तो क्रोध शान्त हो जाएगा । मैंने उससे विनोद में कहा कि यदि वह स्वयं शीशा देखे तब तो ठीक है पर कोई दूसरा व्यक्ति उसके सामने यदि शीशा रख दे, तो बड़ी समस्या उठ खड़ी होगी । नारदजी के जीवन में जो क्रोध था, वह शीशे को ही लेकर था । नारद की पहली समस्या तो यह थी कि वे भगवान विष्णु से सुन्दरता माँगते हैं । तत्पश्चात यदि वे स्वयं शीशे में देख लेते कि भगवान ने कैसी सुन्दरता दी है, तो झगड़े से बच जाते । पर उन्होंने मान लिया कि भगवान ने तो अब मुझे सुन्दर बना ही दिया । नारद ने कहा था - 'आन भाँति नहिं पावौं ओही' । इस पर भगवान ने तुरन्त नारद को उत्तर दिया था - मुनिजी, पहले यह बताइए कि यदि रोगी कुपथ्य माँगे तो क्या वैद्य देता है ? आप तो रोगी हैं और मुझसे कुपथ्य माँग रहे हैं, तो फिर मैं कैसे दूँ ? अब भगवान का वाक्य तो बड़ा स्पष्ट था, पर नारदजी को वह सुनाई ही नहीं पड़ा ।
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