भगवान श्रीराम क्रोध को भी स्वीकार करते हैं । वे जीवन में यत्र-तत्र क्रोध करते हुए दिखाई देते हैं । खर-दूषण के साथ युद्ध करते हुए क्रोध से भरे दिखाई देते हैं । नारद के प्रसंग में भी उनमें क्रोध की स्वीकृति दिखाई देती है । अन्य प्रसंगों में भी क्रोध का वर्णन है । प्रश्न उठता है कि क्रोध को स्वीकार करने में ईश्वर का उद्देश्य क्या है ? इस संदर्भ में सुग्रीव का प्रसंग ही ले लें । सुग्रीव राज-पाट पाकर भोगों में भूल जाते हैं । भगवान के पास जाने की उन्हें याद ही नहीं रहती । गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम ने रोष को स्वीकार किया । उन्हें सुग्रीव पर रोष आता है और वे लक्ष्मण को श्रोता बनाते हैं । जहाँ क्रोध का प्रसंग हो, वहाँ लक्ष्मण से बढ़िया श्रोता और कोई नहीं हो सकता, क्योंकि लक्ष्मणजी क्रोध के बड़े समर्थक हैं । उनके चरित्र में अग्नि की तेजस्विता है । उनका क्रोध रामायण में सर्वत्र दिखाई देता है । तो, आज जब भगवान श्रीराघवेन्द्र ने क्रोध की यह नई भूमिका स्वीकार की, तो लक्ष्मणजी यह सोचकर आश्चर्यचकित हो गए कि मेरी भूमिका प्रभु ने कैसे ले ली । प्रभु ने कहा - लक्ष्मण ! देखा सुग्रीव को ? राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पाकर उसने भी मेरी सुधि भुला दी ! लक्ष्मणजी ने पूछा - तो महाराज, इस अपराध के बदले में क्या करने का विचार है ? प्रभु बोले - जिस बाण से मैंने बालि का वध किया था, उसी से मैं उस मुर्ख सुग्रीव का कल वध करूँगा ।
........आगे कल .......
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