भगवान से जब नारद ने कहा कि आप मुझे अपनी सुन्दरता दे दीजिए, आप मेरे बड़े हितैषी हैं, तो भगवान ने कह दिया - तुम्हारा जिसमें परम हित होगा, मैं वही करूंगा । इतना सुनकर नारदजी ने आगे भगवान क्या कह रहे हैं, यह सुनना आवश्यक नहीं समझा । वे शरीर से तो भगवान के सामने खड़े थे, पर मन में कल्पना कर रहे थे कि मैं स्वयंवर-सभा में बैठा हुआ हूँ, विश्वमोहिनी जयमाला लेकर आई हैं और मेरे गले में पहना रही हैं । जब व्यक्ति के मन में तीव्र मानसिक रोग उत्पन्न हो जाता है और वह प्रलाप करने लगता है, तब बीच-बीच में कोई सुसंगत बात भी कह देता है । पर इसके कारण उसे स्वस्थ्य नहीं समझना चाहिए । वात के प्रकोप की यह विशेषता है कि रोगी में बोलने की क्षमता तो बढ़ जाती है, पर वह विवेकयुक्त वाणी का प्रयोग नहीं करता । जब सन्निपात इत्यादि में रोगी बहुत बकबक करने लगे और कभी-कभी उसके मुँह से कोई सुसंगत बात निकल भी जाए, तो लोग कहते हैं कि इसको वात हो गया है । नारद भी काम-वात से पीड़ित हो गये थे, उन्होंने भी एकाध सुसंगत बात कही - मेरा हितैषी भगवान से बड़ा कोई नहीं है । भगवान ने मन-ही-मन हँसकर कहा - नारद, बस इतनी ही बात तुमने ठीक कही, पर आगे जितनी बातें तुम मुझसे माँग रहे हो, वह तो कुपथ्य की याचना है ।
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