Friday, 27 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भगवान से जब नारद ने कहा कि आप मुझे अपनी सुन्दरता दे दीजिए, आप मेरे बड़े हितैषी हैं, तो भगवान ने कह दिया - तुम्हारा जिसमें परम हित होगा, मैं वही करूंगा । इतना सुनकर नारदजी ने आगे भगवान क्या कह रहे हैं, यह सुनना आवश्यक नहीं समझा । वे शरीर से तो भगवान के सामने खड़े थे, पर मन में कल्पना कर रहे थे कि मैं स्वयंवर-सभा में बैठा हुआ हूँ, विश्वमोहिनी जयमाला लेकर आई हैं और मेरे गले में पहना रही हैं । जब व्यक्ति के मन में तीव्र मानसिक रोग उत्पन्न हो जाता है और वह प्रलाप करने लगता है, तब बीच-बीच में कोई सुसंगत बात भी कह देता है । पर इसके कारण उसे स्वस्थ्य नहीं समझना चाहिए । वात के प्रकोप की यह विशेषता है कि रोगी में बोलने की क्षमता तो बढ़ जाती है, पर वह विवेकयुक्त वाणी का प्रयोग नहीं करता । जब सन्निपात इत्यादि में रोगी बहुत बकबक करने लगे और कभी-कभी उसके मुँह से कोई सुसंगत बात निकल भी जाए, तो लोग कहते हैं कि इसको वात हो गया है । नारद भी काम-वात से पीड़ित हो गये थे, उन्होंने भी एकाध सुसंगत बात कही - मेरा हितैषी भगवान से बड़ा कोई नहीं है । भगवान ने मन-ही-मन हँसकर कहा - नारद, बस इतनी ही बात तुमने ठीक कही, पर आगे जितनी बातें तुम मुझसे माँग रहे हो, वह तो कुपथ्य की याचना है ।

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