Saturday, 28 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान ने नारद को जब विदा कर दिया, तो नारद ने पहले दर्पण नहीं देखा । यह आत्मनिरीक्षण का अभाव सूचित करता है । उसके पश्चात वे स्वयंवर-सभा में पहुँचे । वहाँ जो अन्य लोग थे, वे तो नारद को नारद ही समझ रहे थे और उसी भाव से प्रणाम कर रहे थे, लेकिन शंकरजी के जो दो गण उनके दोनों ओर बैठे हुए थे, वे उन्हें बंदर की आकृति वाला देख रहे थे । शिवजी के ये दोनों गण नारदजी पर कटाक्ष करते हुए कहने लगे - वाह, भगवान ने इन्हें कैसा सौंदर्य दिया है । तो भई, अगल-बगल वालों से सदा सावधान रहना चाहिए । वे क्या कह रहे हैं, किस उद्देश्य से कह रहे हैं, पता नहीं चलता । जब दाएँ-बाएँ वाले लोग प्रशंसा करते हैं, तो समझ में नहीं आता कि उसमें कितना व्यंग्य है और कितना कटाक्ष । बेचारे प्रशंसा के आतुर व्यक्ति तो यह समझ ही नहीं पाते । तो, यहाँ शिवजी के दोनों गण नारदजी को सुनाते हुए आपस में कह रहे हैं - लगता है कि विश्वमोहिनी इन्हीं के गले में जयमाल डाल देंगी, ये तो दूसरे साक्षात हरि (बन्दर) लग रहे हैं । और नारद यह सुनकर बड़े फूल रहे हैं, अपने आप को भगवान के समान सुन्दर समझ रहे हैं । उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि दूसरे क्या समझ रहे हैं । वास्तव में होना तो यह चाहिए था कि नारद अपने को देखते ।

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