Monday, 23 May 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

....कल से आगे .......
लक्ष्मणजी ने देखा कि भगवान को क्रोध आ गया है । उन्होंने उनके चरणों को पकड़ लिया और बोले, महाराज! मेरा काम मुझे ही करने दीजिए, आप न करें तो ही ठीक है । तो, क्रोध की भूमिका यह है कि अगर कोई अपराधी है, तो उसे दण्ड देने की आवश्यकता है । जब अग्नि घर के एक कमरे में जलती होती है, तब भोजन को पकाती है । जो व्यक्ति वह पका हुआ भोजन ग्रहण करता है, उसके भीतर भी वह अग्नि पित्त के रूप में भोजन को पचाती है, शरीर को शक्ति देती है । पर वही अग्नि यदि अनियंत्रित हो जाय तो घर में आग लगा सकती है, व्यक्ति को जलाकर खत्म कर सकती है । अभिप्राय यह है कि क्रोध अगर सन्तुलित होगा, समन्वित होगा, सीमा में होगा, तो वह बुराई की विनष्ट करने वाला होगा । यहाँ पर भगवान राम के क्रोध की भूमिका यही है । लक्ष्मणजी ने भगवान राम से जब यह कहा कि आपका विचार तो बड़ा अच्छा है, मैं अभी जाकर सुग्रीव को मार देता हूँ, तो भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कहा कि लक्ष्मण! अग्नि अगर जलावे तो कौन पसन्द करेगा ? अग्नि यदि शरीर में शक्ति बढ़ावे, तेजस्विता बढ़ावे, तब तो वह सबको प्रिय होगी । वे लक्ष्मणजी से कहते हैं - धनुष-बाण लेकर सुग्रीव के पास जाओ, लेकिन भय दिखाकर उसे दूर भगाना नहीं, बल्कि मेरे पास ले आओ ।

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