Wednesday, 31 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

कैकेयीजी और रावण के चरित्र की अगर हम तुलना करके देखें, तो यही दिखाई देगा कि कैकेयीजी भी गम्भीर रूप से रोगग्रस्त हैं और रावण भी । दोनों में सन्निपात के लक्षण दिखाई दे रहे हैं । और दोनों के चिकित्सक श्रीभरतजी और श्रीहनुमानजी भी समान रूप से महान हैं । पर दोनों के रोग में वही एक अन्तर है, जो सन्निपात के सन्दर्भ में कहा गया । कैकेयीजी पर रोग का आक्रमण हुआ बुद्धि को केन्द्र बनाकर । मन्थरा ने उनकी बुद्धि में विभ्रम उत्पन्न कर दिया है । कैकेयी के चित्त में तो संस्कार यही था कि राम मुझसे बहुत प्रेम करते हैं, यहाँ तक कि अपनी माँ से भी अधिक । यदि उनका यह संस्कार दृढ़ बना रहता तो सम्भवतः मन्थरा की बातें उन्हें प्रभावित नहीं कर पातीं । प्रारंभ में तो प्रभावित हुई भी नहीं । जिस समय मन्थरा ने यह कहा कि कल राम को राज्य प्राप्त होने वाला है, उस समय तो प्रसन्न होकर उन्होंने यही कहा था, अगर तेरी बात सच हुई तो तू जो माँगेगी, वही दूँगी । लेकिन कैकेयी की इस भावना का आधार क्या था ? मन्थरा ने देख लिया था कि जड़ कहाँ है ? इस भाव में कि राम अपनी माँ से भी अधिक प्रेम मुझसे करते हैं । बस मन्थरा ने देख लिया कि इस प्रेम का आधार है अहं । यद्यपि वह सात्विक अहं था, पर था अहं ही । और मन्थरा ने सबसे पहले उनके इसी सात्विक अहं को उभाड़ा ।

Tuesday, 30 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

आयुर्वेदशास्त्र में दो प्रकार के सन्निपातों का वर्णन है । इन दोनों में से एक प्रकार तो अयोध्या में दिखाई देता है और दूसरा लंका में । पर इन दोनों में एक अंतर है और वह अंतर आयुर्वेदशास्त्र के अनुसार यह है कि एक में मुख्य रूप से मस्तिष्क आक्रांत होता है और दूसरे में आँत । जब मस्तिष्क आक्रांत होता है, तब रोगी प्रलाप करने लगता है और ज्वर की तीव्रता से मस्तिष्क काम करना बन्द कर देता है । जब आँत आक्रांत होती है, तो पाचन-क्रिया बन्द हो जाती है और एक तरह से अतिसार हो जाता है । आयुर्वेद की मान्यता यह है कि सन्निपात से जब मस्तिष्क प्रभावित होता है, तब उसकी चिकित्सा अपेक्षाकृत सरल है, क्योंकि ज्वर में ताप अधिक होने पर सिर पर ठण्डे पानी की पट्टी रखने से उत्ताप कम हो जाता है, रोग का प्रकोप घट जाता है और रोगी स्वस्थता की ओर बढ़ने लगता है । लेकिन जब आँतों पर उसका अधिक प्रभाव पड़ता है, और सन्निपात के साथ अतिसार भी हो जाता है तो वैद्य उसे प्रायः असाध्य मानते हैं । उसकी चिकित्सा करना कठिन है । यदि मन के संदर्भ में देखें तो इसका अभिप्राय यह है कि काम, क्रोध व लोभ के दो रूप हैं । एक तो वह है जो अयोध्या में दिखाई देता है और दूसरा वह है जो लंका में, पर एक तो साध्य था और दूसरा असाध्य । एक की चिकित्सा हो गयी और दूसरे की नहीं हो पाई । एक रोगी स्वस्थ हो गया और दूसरे में रोगी की मृत्यु हो गई, सारे समाज की मृत्यु हो गई । और इसका सीधा-सा तात्पर्य यह है कि काम-क्रोध-लोभ के साथ जहाँ अहंकार की वृत्ति सम्मिलित हो जाए, तो वहाँ बुराइयाँ असाध्य हो जाती हैं । जिस समाज या व्यक्ति के जीवन में काम-क्रोध-लोभ असंतुलित हो जाए, पर उसके अन्तःकरण में इसके लिए पश्चाताप या ग्लानि न हो तो वह स्वस्थ कैसे होगा ?

Monday, 29 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

......कल से आगे.......
सहस्त्रार्जुन या बालि बहिरंग दृष्टि से भले ही रावण को हरा दें, पर सारा विश्व तो रावण के ही वश में था । इसका अभिप्राय यह है कि रावण में मोह की वृत्ति है - मोह का अर्थ आप जानते ही हैं - जानते हुए भी अनजान की तरह आचरण करना । यह एक ऐसी बुराई है जो गहरी और सबके मूल में है । अन्य बुराइयाँ तो दिखाई देती हैं और उन्हें नष्ट करना एक हद तक सम्भव भी है, पर वृक्ष को काट देने पर जमीन के नीचे छिपी हुई जड़ों से शक्ति पाकर नए अंकुर निकल आते हैं । और इस बुराई को समूल मिटाने की शक्ति परशुराम में भी नहीं थी । बल्कि एक ओर जहाँ उनके द्वारा काम और लोभ पर कुछ नियंत्रण प्राप्त हुआ वहीं उसके साथ एक नई समस्या उत्पन्न हो गयी और वह थी अहंकार और क्रोध की । इसलिए भगवान राम के अवतार की आवश्यकता हुई । जब समाज में काम, क्रोध, लोभ सभी असंतुलित हो गये हों, ऊपर से अहंकार का डमरुआ हो गया हो और जितने भी मन के रोग हैं वे सब फैल गये हों, तब उस समय चिकित्सा करना बड़ा कठिन होता है । अगर रोग के सन्दर्भ में देखें तो इसे सन्निपात कहेंगे ।

Sunday, 28 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

परशुरामजी की कृपा से समाज में उस समय काम और लोभ कुछ नियन्त्रित अवश्य हुआ था, लेकिन अहंकार या क्रोध की वृत्तियाँ उनके द्वारा नियन्त्रित नहीं हो पाईं । वे सहस्त्रार्जुन को भले ही जीत गये हों, पर रावण को नहीं जीत पाए । यद्यपि तर्क तो यही कहता है कि रावण को परास्त करने वाले सहस्त्रार्जुन को जब परशुरामजी परास्त कर देते हैं तब तो रावण पर भी उन्हें विजय मिलनी ही चाहिए थी । लेकिन नहीं मिली । क्यों ? इसका उत्तर यह है कि रावण के जीवन में दुर्गुणों का जो अतिरेक है उसे मिटाने की शक्ति परशुराम में नहीं है । सहस्त्रार्जुन की तुलना में रावण के दुर्गुण अधिक शक्तिशाली हैं । सहस्त्रार्जुन चाहे जितना पराक्रमी क्यों न हो, पर वह सारे विश्व को अपने अधीन नहीं कर पाया था, जबकि रामचरितमानस में लिखा हुआ है कि सहस्त्रार्जुन या बालि बहिरंग दृष्टि से भले ही रावण को हरा दें, पर सारा विश्व तो रावण के ही वश में था ।
      .......आगे कल ......

Saturday, 27 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

.......कल से आगे......
परशुरामजी चाहते थे कि श्रीराम यह स्वीकार करें कि संसार के अप्रतिम योद्धा परशुराम हैं ? भगवान राम ने कहा, महाराज ! जो शब्द आप सुनना चाहते हैं वह तो टकराहट और झगड़े की जड़ है । यद्यपि उन्होंने लक्ष्मणजी को आँख दिखाकर संकेत कर दिया था कि परशुरामजी से इस तरह बोलना ठीक नहीं है, परन्तु परशुरामजी से भी बड़ी विनम्रता से कह दिया कि महाराज ! आप इस लड़के पर बहुत रुष्ट हो रहे हैं, लेकिन क्षमा करें, सारा दोष इस लड़के का ही नहीं है । क्यों ? भगवान ने कहा - महाराज ! अगर आप फरसा लेकर न आए होते तो अवश्य ही यह आपके चरणों की धूल अपने सिर पर लगा लेता । यह फरसा ही झगड़े का कारण है । इसे जो आप कन्धे पर ढो रहे हैं, यह प्रदर्शन की वृत्ति है । दान अगर प्रदर्शन की वृत्ति से प्रेरित हो तो उसमें कोई सार्थकता नहीं रह जाती । वह तो अहंकार का पोषक हो गया है । भगवान राम ने कहा, महाराज ! यदि आप विप्र के रूप में आते तो क्या इस बालक का इतना साहस हो सकता था ? इसे तो शस्त्र प्रेरित कर रहा है । जब आप क्षत्रिय के वेश में आए हैं तो क्षत्रिय वृत्ति से इसके अन्तःकरण में आपसे टकराने की वृत्ति उठ गई । अगर आप ब्राह्मण के वेश में आते तो समन्वय हो जाता । तब यह विनम्र होकर आपके चरणों में प्रणाम करता और आप आर्शीवाद देते । प्रणाम और आर्शीवाद का सार्थक मिलन हो जाता ।

Friday, 26 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

कामना-पूर्ति में बाधा आने पर सहस्त्रार्जुन को क्रोध आ गया । पर यह क्रोध तो परशुराम के जीवन में भी दिखाई देता है, जबकि उनके जीवन में न तो काम की स्वीकृति है, न लोभ की । उन्होंने कभी किसी के राज्य पर अधिकार नहीं किया, विवाह नहीं किया, वे बाल ब्रह्मचारी हैं । तब तो उनसे पूछा जा सकता है कि आपमें यह क्रोध कैसे आ गया ? उन्होंने कहा, लोककल्याण के लिए मैंने क्रोध को स्वीकार किया है । मैंने समाज में एक यज्ञ किया और उस यज्ञ में क्रोध को अग्निकुण्ड बनाकर अहंकारी राजाओं की आहुति दी है । परशुरामजी ने लोभ की समस्या को हल करने के लिए क्रोध को स्वीकार किया । क्रोध अहंप्रधान तो होता ही है, अब उनकी बुद्धि भी क्रोध का समर्थन करने लगी । वे भगवान राम से कहते हैं - तू ब्राह्मण के धोखे में मेरा निरादर करके बोल रहा है । यह अहं की प्रबलता है । भगवान राम ने उन्हें ब्राह्मण कहकर उनका सम्मान ही किया था, अपमान नहीं । लेकिन गोस्वामीजी लिखते हैं - परशुरामजी बिगड़कर भगवान राम से बोले, तू ब्राह्मण कहकर मेरा अपमान कर रहा है - बोलसि निदरि बिप्र के भोरे । इसका अभिप्राय क्या है ? ब्राह्मण कहकर भगवान राम ने उनका सम्मान किया कि अपमान ? ब्राह्मण जब सभी वर्गों में श्रेष्ठ और पूज्य है, तो ब्राह्मण कहकर पुकारने में उन्हें सम्मान में कमी क्यों लग रही है ? इसका रहस्य क्या है ? यह कि अहंकार जितना प्रबल होगा, सम्मान की माँग भी उतनी ही तीव्र होगी । जब भगवान राम ने ब्राह्मण कहकर पुकारा तो परशुरामजी को लगा कि ब्राह्मण तो लाखों हैं, इसने मुझे उन्हीं की बराबरी में बिठा दिया । मेरा स्थान तो सबसे ऊँचा होना चाहिए ! भगवान श्रीराघवेन्द्र झुक जाते हैं । वे कहते हैं, महाराज ! ब्राह्मण कहने में आपका अपमान होगा इसकी तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता । मेरी दृष्टि में तो जो सबसे बड़ा सम्मानजनक शब्द है, वही मैंने आपके लिए कहा । लेकिन परशुरामजी क्या सुनना चाहते थे ?
       .......आगे कल......

Thursday, 25 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

कामधेनु एक ओर जहाँ परदुखकातर महात्माओं के पास कल्याणकारी है, वहीं दूसरी ओर भोगपारायण व्यक्ति के पास उतनी ही विनाशकारी भी है । एक ओर सदुपयोग हो सकता है तो दूसरी ओर उसका दुरुपयोग भी सम्भव है । भोगपारायण व्यक्ति संकल्पमात्र से भोग की वस्तुएँ पा लेने की स्थिति में कर्मशून्य होकर अपरिमित भोग में डूब जाएगा । समस्त भोगों को अपने लिए समेटकर वह सदा दूसरों के लिए अमंगल और दुख कष्ट की कामना करेगा । इसलिए मुनि जमदग्नि ने स्पष्ट कह दिया कि कामधेनु राजा के पास नहीं मुनि के ही पास रहेगी । और तब उस राजा के असंतुलित लोभ का परिणाम प्रकट हो गया । पहले तो उसे ईर्ष्या हुई, फिर लोभ और अब लोभ की पराकाष्ठा यह है कि बलपूर्वक छीन लेने की चेष्टा होने लगी । सामनेवाला व्यक्ति अगर माँगने पर न दे और लोभ शान्त हो जाए, तब तो वह नियन्त्रित लोभ है । लेकिन अगर उस इन्कार से क्रोध आ जाय और बलपूर्वक छीनने का प्रयास आरम्भ हो जाय, तो समझ लेना होगा कि व्यक्ति के मन, बुद्धि और अहंकार - तीनों ही लोभ से आक्रांत हो गये हैं और साथ ही त्रिधातु भी कुपित हो गये हैं ।

Wednesday, 24 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

सहस्त्रार्जुन ने जब कामधेनु के विषय में जमदग्नि से सुना तब उसने जमदग्नि से कहा, महाराज ! जब आपको कुटिया में रहकर तपस्या का ही जीवन व्यतीत करना है, तो आपके पास इस कामधेनु की क्या उपयोगिता है ? इसकी उपयोगिता तो मेरे पास है । मुझे प्रजा का पालन, संरक्षण तथा संचालन करना है, और इसके लिए मुझे कामधेनु से क्षमता प्राप्त हो जाएगी । जमदग्नि ने उन्हें बता दिया कि कामधेनु मुनि के ही पास रहेगी, राजा के पास नहीं । इसका तात्पर्य क्या है ? यह कि जो मुनि है, मननशील है, विचारशील है, उसके जीवन में संकल्प मात्र से आवश्यकता की पूर्ति हो जाय तो इसमें कोई दोष नहीं है । क्योकि जो महात्मा है, उसका संकल्प सबके लिए कल्याणकारी ही होगा । पर जिस व्यक्ति के मन में भोगवासनाएँ हैं, उसे कर्मठ होना चाहिए और पुरुषार्थ के द्वारा ही अपनी कामना पूरी करने की चेष्टा करनी चाहिए ।

Tuesday, 23 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

वैभवशाली व्यक्ति को किसी दूसरे का वैभव देखकर प्रसन्नता नहीं होती । जब वह देखता है कि दूसरे के पास इतना वैभव है, तो उसे यह जानने की इच्छा होती है कि इतना वैभव उसके पास आया कहाँ से ! सहस्त्रार्जुन ने जमदग्नि से पूछ भी लिया, महाराज ! आप तो वन में स्थित एक कुटिया में निवास करते हैं, आपके पास इतना वैभव कहाँ से आया ? जमदग्नि ने भोलेपन से कह दिया, मेरे पास कामधेनु है । उस कामधेनु से मैं जो माँगता हूँ, वह मुझे देती है । यह सारा वैभव उसी का दिया हुआ है । बस इतना सुनते ही पुरूषार्थी सहस्त्रार्जुन की वृत्ति बदल गई । अब तक उसमें किसी वस्तु को पाने के लिए पुरुषार्थ की वृत्ति थी, पर अब कौन-सी वृत्ति आ गई ? कामधेनु के प्रति लोभ की । कामधेनु अर्थात बिना कुछ किए जो चाहें वह मिल जाए । पहले तो व्यक्ति यह सोचता है कि यह करेंगे तब यह मिलेगा । और कामधेनु हो तो करें कुछ नहीं, बैठे-बैठे जो चाहें वह मिल जाए । यह लोभ की पराकाष्ठा है । कुछ न करें और इच्छित वस्तु मिल जाए । पुरूषार्थी सहस्त्रार्जुन में अब बिना कुछ किए फल पाने की वृत्ति आ गई । जब तक कामना के साथ कर्म करने की वृत्ति रहती है, तब तक लोभ में सन्तुलन बना रहता है, लेकिन जब बिना कुछ किए फल पाने की वृत्ति आती है तब क्या स्थिति होती है, सहस्त्रार्जुन का चरित्र इसी का चित्र प्रस्तुत करता है ।

Monday, 22 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

ऐसा वर्णन आता है कि सहस्त्रार्जुन धर्मपूर्वक पृथ्वी पर शासन करता था । वह बड़ा पराक्रमी था । एक बार वह वन में मृगया खेलने गया । वहाँ पर उसके मन में आया कि जब यहाँ तक आ ही गये हैं तो थोड़ी दूर और चलकर महात्मा जमदग्नि को भी प्रणाम कर लें । लगता है कि यह भी उसके जीवन की सात्त्विक वृत्ति थी । रावण की तरह वह सद्वृत्तियों से शून्य नहीं था । पर उसके जीवन में एक दोष प्रबल हो गया था । रावण और सहस्त्रार्जुन के जीवन की अगर तुलना करें तो दीख पड़ेगा कि जहाँ मुनियों के आश्रमों को विनष्ट करने में रावण को आनन्द का अनुभव होता था, वहाँ सहस्त्रार्जुन के जीवन में मुनियों के प्रति आदर की वृत्ति थी, जिससे प्रेरित होकर वह जमदग्नि के आश्रम में जाता है । यहाँ तक उसकी बुद्धि स्वस्थ और अनुकूल दिखाई देती है । जब वह जमदग्नि के आश्रम पहुँचा तो जमदग्नि ने उसका स्वागत और सम्मान किया, क्योंकि ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं । मननशील त्यागी महात्मा और सत्ताधीश एक-दूसरे के सहायक हो सकते हैं । शासक मुनियों के समक्ष विनत होकर उनसे प्रेरणा ले सकते हैं और सत्ताधीश मुनियों को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं । दैत्यों और राक्षसों से मुनियों की रक्षा करना राजा का कर्तव्य है । यह एक स्वाभाविक क्रम है कि दोनों एक-दूसरे को महत्व दें । और वही यहाँ पर हुआ । पर आगे चलकर सहस्त्रार्जुन के जीवन में इसकी प्रतिक्रिया बड़ी प्रतिकूल हुई । राजा का स्वागत करने जब जमदग्नि बढ़े तो यह सोचते हुए कि स्वागत आश्रम की परम्परा के अनुसार किया जाय अथवा राजसिक परम्परा के अनुकूल ? उन्हें यही लगा कि ये तो राजसिक व्यक्ति हैं, इनको आश्रम के कन्द-मूल-फल सम्भवतः सुस्वादु और प्रिय नहीं लगेंगे, इसलिए इनका सत्कार तो राजसिक वैभव से किया जाना चाहिए और जब कामधेनु के माध्यम से दिव्य वैभव के साथ जमदग्नि ने सहस्त्रार्जुन का स्वागत किया तो सहस्त्रार्जुन के मन में ईर्ष्या जाग उठी ।

Sunday, 21 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

एक बार रावण और सहस्त्रार्जुन के बीच भी टकराहट हो गई । लेकिन रावण सहस्त्रार्जुन को नहीं जीत पाया । जीत भी नहीं सकता था । इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि सहस्त्रार्जुन जैसे लोभ का प्रतीक है, रावण मोह का प्रतीक है । अभिप्राय यह है कि लोभ और मोह की वृत्तियों में टकराहट होने पर बड़ी विचित्र बात है कि मोह लोभ से परास्त हो गया । बुद्धि ने मोह को पराजित कर दिया, पर स्वयं दुर्गुणों से मुक्त नहीं हो सकी है । यद्यपि मोह की वृत्ति सहस्त्रार्जुन के जीवन में प्रबल नहीं है, पर लोभ की वृत्ति अत्यंत प्रबल हो गयी है ।

Saturday, 20 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

काम, क्रोध और लोभ ये तीनों यद्यपि मन के रोग कहे जाते हैं । पर अन्तःकरण की दृष्टि से अलग-अलग बाँटकर कहें तो काम मन प्रधान है । लोभ से बुद्धि जुड़ी हुई है और क्रोध से अहंकार संयुक्त है । अगर ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्ट दिखाई देगा कि व्यक्ति के अन्तःकरण में जब काम की वृत्ति आती है तो वह सबसे पहले उसके मन को आक्रांत करती है । मन जब भोग के लिए व्याकुल होने लगता है, तब इसी भोग-पिपासा को मिटाने के लिए वह काम का आश्रय लेता है । और लोभ ? लोभ जब आता है तो उसे स्थान देती है बुद्धि । बुद्धि उसका समर्थन करती है । लोभ दिखाई तो देता है मन में, पर बुद्धि उसके समर्थन में बड़े जोर-शोर से तर्क देती है । व्यक्ति लोभ क्यों करता है ? बुद्धि कहती है, बुढ़ापे में क्या करोगे ? परिवार की वृद्धि होगी, तब क्या होगा ? भविष्य की चिन्ता करना तो एक सजग व्यक्ति का कर्तव्य है । बुद्धि व्यक्ति के सामने भविष्य की चिन्ता खड़ी कर देती है । व्यक्ति सोचता है कि इतना संग्रह कर लें कि जिससे भविष्य में निश्चिन्त होकर रह सकें । इस तरह लोभ की वृत्ति में बुद्धि की सक्रियता दिखाई देती है । क्रोध अहं प्रधान है । अहं जितना तीव्र होगा, क्रोध भी उतना तीव्र होगा । सामनेवाला व्यक्ति मेरी बात क्यों नहीं सुनता, मेरी बात क्यों नहीं मानता, मेरी बात क्यों टालता रहता है ? इसी बात को लेकर क्रोध आ जाता है ।चित्त इन तीनों के पीछे है । मन, बुद्धि और अहंकार में से अगर कोई एक अस्वस्थ हो और अन्य स्वस्थ, तो चिकित्सा करना सरल होता है । पर मन के साथ बुद्धि और अहंकार भी अस्वस्थ हों और पीछे से चित्त भी संस्कार के रूप में उन्हें शक्ति देता रहे, तो उस व्यक्ति की चिकित्सा करना बड़ा कठिन हो जाता है ।

Friday, 19 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

परशुरामजी ने सहस्त्रार्जुन की एक हजार भुजाओं को काट दिया और क्षत्रियों को दण्ड दिया । सहस्त्रार्जुन का दमन करने से क्या अभिप्राय है ? सहस्त्रार्जुन लोभ का प्रतीक है । उसके चरित्र का वर्णन इस प्रकार मिलता है - सहस्त्रार्जुन एक योग्य राजा था, वह बड़ा पुरूषार्थी था और बड़ी कुशलता से समाज का संचालन करता था । उसकी एक हजार भुजाएँ थी और उनमें कर्म करने की अद्भुत क्षमता थी । ऐसी क्षमता यदि किसी व्यक्ति को प्राप्त हो जाय तो वह कल्याणकारी भी हो सकता है और अकल्याणकारी भी । और ये दोनों ही पक्ष हमें सहस्त्रार्जुन के जीवन में दिखाई देते हैं । हजार भुजाओं से अद्भुत कर्म करने की क्षमता का उपयोग यदि व्यक्ति दूसरों की सेवा, परोपकार और रक्षा करने के लिए करे तो वह कल्याणकारी हो सकता है । जैसा कि सहस्त्रार्जुन के जीवन में पहले था । लेकिन इस कार्यक्षमता के साथ अगर लोभ जुड़ जाय और वह बढ़कर अपार और असंतुलित हो जाय तो वह अकल्याणकारी हो जाता है । और कर्म के साथ इसकी सम्भावना जुड़ी रहती है । कर्म करने की प्रेरणा जितनी ही तीव्र होगी, आकांक्षाएँ भी उतनी ही तीव्र होंगी । साथ में स्वार्थपरता और लोभ की वृत्ति रहती है । सहस्त्रार्जुन के साथ भी यही हुआ । और केवल सहस्त्रार्जुन ही क्यों, सम्पूर्ण क्षत्रिय जाति में यह वृत्ति आ गई । इसके परिणामस्वरूप राजाओं में यह रोग फैल गया कि अधिक-से-अधिक देशों पर अधिकार करके मनमाने ढंग से प्रजा का शोषण करो और केवल अपने ही श्री, वैभव तथा भोग की चिन्ता करो ।

Thursday, 18 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

आयुर्वेद में कहा गया है कि व्यक्ति के शरीर में वात, पित्त और कफ में से कोई एक कुपित हो जाय तो उसकी चिकित्सा अपेक्षाकृत सरल होती है लेकिन तीनों यदि एक साथ कुपित हो जाएँ तो उसकी चिकित्सा करना सहज नहीं है । इसी प्रकार जब व्यक्ति के जीवन में काम, क्रोध और लोभ, तीनों वृत्तियाँ एक साथ विकृत हो जाएँ, तब समस्या जटिल हो जाती है । रामचरितमानस में इसका सुन्दर दृष्टांत है । परशुरामजी को हम अवतार मानते हैं । उनका अवतार क्यों हुआ ? उनके होते हुए समाज को श्रीराम की आवश्यकता क्यों हुई ? इसका उत्तर यह दिया गया कि परशुरामजी ने समाज की एक समस्या का समाधान किया, पर उसकी प्रतिक्रिया अपने आप में एक समस्या बन गई ।

Wednesday, 17 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

व्यक्ति या समाज में जब काम, क्रोध और लोभ की वृत्ति असंतुलित हो जाती है तो यह असंतुलन मन के साथ मनुष्य की बुद्धि, अहंकार और चित्त तक को आक्रांत कर देता है । गोस्वामीजी इसे अस्वस्थता का गम्भीर लक्षण मानते हैं । वे कहते हैं कि रोग अगर किसी एक अंग में हो या अन्तःकरण के किसी एक भाग में हो तो उसकी चिकित्सा करना सरल है, पर जब मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, चारों ही रोगग्रस्त हो जाएँ अथवा समाज समग्र रूप से रोगग्रस्त हो जाय तो उसकी चिकित्सा करना करना अत्यन्त कठिन हो जाता है । यह बात तो हमें अपने जीवन में भी दिखाई देती है । कई बार जब हमारा मन अस्वस्थ हो जाता है, तो भी बुद्धि स्वस्थ रहती है । इसका परिणाम यह होता है कि जब मन में कोई बुराई आती है तो बुद्धि तुरन्त कह देती है कि यह अशोभनीय है, त्याज्य है । मन पर बुद्धि का नियन्त्रण बना रहता है । इसी प्रकार बहिरंग व्यवहार में मानसिक और भौतिक धरातल पर व्यस्त हो जाने पर भी हमारा चित्त एकांत समाहित और शान्त हो जाए, तो मन की बुराइयों को वहाँ प्रश्रय नहीं मिलता । और व्यक्ति जब विनम्र हो जाता है तब मन की बुराइयों को अहं का समर्थन नहीं मिल पाता । इसी तरह कभी मन, कभी बुद्धि, कभी चित्त और कभी अहंकार अस्वस्थ हो जाते हैं, पर अन्तःकरण-चतुष्ट्य में से किसी एक के अस्वस्थ हो जाने पर शेष तीन स्वस्थ रहते हैं और समस्या गम्भीर नहीं हो पाती । समस्या तो तब जटिल हो जाती है जब अन्तःकरण समग्र रूप से अस्वस्थ हो जाता है । तब उस व्यक्ति की चिकित्सा अत्यन्त कठिन हो जाती है ।

Tuesday, 16 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

अभी कुछ दिन पूर्व कानपुर में 'मानस-संगम' के तत्वावधान में रामकथा का आयोजन किया गया था । वहाँ अनेक विचारक और विद्वान वक्ता एकत्र हुए थे । उन लोगों ने विविध रूपों में अपनी बातें रखीं । पर उनमें से कइयों का एक स्वर बड़ा ही मुखर था और वह यह कि समाज में जो इतनी अशान्ति, अव्यवस्था तथा भ्रष्टाचार व्याप्त है, तो ऐसी स्थिति में इन आयोजनों की क्या सार्थकता है ? क्या सचमुच इन आयोजनों से कोई प्रयोजन सिद्ध हो रहा है ? इस सन्दर्भ में तो हम यही कहेंगे कि चिकित्सा की अधिकता इसी बात की द्योतक है कि समाज में रोग अत्यधिक व्याप्त है । रोग की व्यापकता के कारण अगर अनेक चिकित्सकों की आवश्यकता हो जाय तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं । और ऐसा कभी नहीं हो सकता कि व्यक्ति या समाज मानसिक रोगों से सदा के लिए पूर्णतया मुक्त हो जाय । किसी-न किसी प्रकार की मानसिक समस्या समाज में सदा ही विद्यमान रहती है और उसकी चिकित्सा भी की जाती है, उसे मिटाने की चेष्टा की जाती है । कभी-कभी जब समाज में भोगवाद की प्रबलता होती है तो कोई महापुरुष आकर त्याग का मार्ग प्रशस्त करते हैं ।

Monday, 15 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

काम, क्रोध, लोभ की वृत्तियाँ सन्तुलित मात्रा में हों, प्रायः ऐसा रह नहीं पाता । कभी कोई एक वृत्ति प्रबल हो जाती है तो कभी कोई दूसरी वृत्ति । जिस युग में लोभ की प्रधानता हो जाती है, उसके समाज में अर्थ को बड़ा महत्व प्राप्त हो जाता है । इसी तरह यदि किसी देश-काल में काम की वृत्ति प्रबल हो जाती है, तब वहाँ भोग ही जीवन का प्रधान लक्ष्य बन जाता है । और कभी किसी समाज में क्रोध की वृत्ति प्रबल हो जाने पर व्यक्ति और समाज में क्रोध की तीव्रतम प्रतिक्रिया हिंसा के रूप में परिलक्षित होने लगती है । इसमें एक क्रम है । जैसे किसी व्यक्ति को ज्वर हो जाता है, तो वैद्य नाड़ी से यह निर्णय करता है कि इसको किस प्रकार का ज्वर है । ज्वर का बहिरंग लक्षण मिलता-जुलता हो तो भी उसके मूल कारण अलग-अलग हो सकते हैं । वैद्य ही नाड़ी-परिक्षण के द्वारा यह निर्णय करता है कि ज्वर का मूल कारण किसकी विकृति है - वात की, पित्त की या कफ की । इसी प्रकार जब व्यक्ति और समाज अस्वस्थ हो जाते हैं, तब उसकी चिकित्सा करने महापुरुष आते हैं । तो यह रोग और औषधि का संघर्ष सदा-सर्वदा चलता रहता है ।

Sunday, 14 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रामचरितमानस की कथा के समापन में मानस रोगों का स्वरूप बताते हुए काकभुशुण्डिजी ने आयुर्वेद में दी गयी स्वस्थता और अस्वस्थता की परिभाषा को ही आधार बनाकर व्यक्ति और समाज के स्वस्थता के स्वरूप को प्रकट किया है । आयुर्वेद में त्रिधातु की स्वीकृति है और वे हैं - कफ, वात और पित्त । काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि व्यक्ति के मन में भी ये त्रिधातु विद्यमान हैं । काम, क्रोध और लोभ की वृत्तियाँ ही मन का वात, पित्त और कफ हैं । जब व्यक्ति या समाज के जीवन में ये वृत्तियाँ सन्तुलित रहती हैं, तभी वह स्वस्थ रहता है । जब काम के द्वारा केवल सृजन का लक्ष्य सामने रखा जाता है, क्रोध के द्वारा बुराइयों को मिटाने का लक्ष्य रहता है और लोभ के द्वारा लोकसेवा के लिए धनसंग्रह का लक्ष्य होता है, तभी काम, क्रोध और लोभ समाज में सार्थक होते हैं ।

Saturday, 13 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

काम-क्रोध-लोभ के स्थान पर ज्ञान-भक्ति-वैराग्य की पुनः प्रतिष्ठा के लिए श्रीभरतजी समाज को लेकर भगवान श्रीराघवेन्द्र के पास चित्रकूट जाते हैं । भगवान श्रीराघवेन्द्र ने मुस्कराकर श्रीभरत को लौटा दिया । कह दिया कि नहीं भरत, इस समय मेरी भूमिका से काम नहीं चलेगा । यह भूमिका तो अकेले तुम्हें ही पूरी करनी है । क्यों ? इसलिए कि हम तीनों ज्ञान-भक्ति-वैराग्य के रहते हुए भी काम-क्रोध-लोभ आ गया तो इसका अर्थ तो यही है कि अब मुझसे भी बड़ा कोई चिकित्सक चाहिए । तो यह कार्य अब तुम्हारा है । और तब श्रीभरत क्या करते हैं ? अपने चरित्र के द्वारा काम-क्रोध-लोभ को नष्ट कर उस पर विजय प्राप्त करते हैं । राज्य नहीं लेते, यह उनकी लोभ पर विजय है । मन्थरा को दण्ड से मुक्त कर देते हैं, यह उनकी क्रोध पर विजय है और नन्दीग्राम में तपस्या करते हैं यह उनकी काम पर विजय है । स्वयं श्रीभरत तो स्वस्थ हैं ही, पर अयोध्या का सारा दुख-संकट इस काम-क्रोध-लोभ के कारण ही है । जब जीवन में दुख आवे तो समझ लेना चाहिए कि काम-क्रोध-लोभ - इनमें से कोई न कोई दुर्गुण आ गया है । इन दुर्गुणों और दोषों पर विजय प्राप्त करके ही हम दुखों से छुटकारा पाते हैं ।

Friday, 12 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

जो भूमिका हनुमानजी की है वही अयोध्या में श्रीभरत की है । इसलिए भरतजी ने गुरु वसिष्ठ से कहा कि जब समाज काम, क्रोध, लोभ से ग्रस्त हो जाय उस समय क्या यह उचित होगा कि मैं सिंहासन पर बैठ जाऊँ ? समाज में काम, क्रोध, लोभ की वृत्तियों को खुली छूट देकर क्या उन्हें शांत किया जा सकता है ? कैकेयी के इस लोभ और क्रोध को स्वीकार कर यदि मैं सिंहासन पर बैठ जाऊँ तो क्या समाज की इस समस्या का समाधान हो जाएगा । यदि मैं अपने जीवन में उन दोषों को स्वीकार कर लूँ, तो क्या अयोध्या के लोग स्वस्थ हो जाएँगे ? गुरु वसिष्ठ ने पूछा - अयोध्या के लोगों के स्वस्थ्य होने का उपाय क्या है ? तो उन्होंने यही कहा कि जिनके जाने से यह संकट आया है, उन्हें ही लौटा लाने की चेष्टा की जाए । इसका सीधा-सा अभिप्राय यह है कि काम-क्रोध-लोभ जीवन में आए तो ज्ञान-भक्ति-वैराग्य जीवन से दूर हो गए । अतः जीवन में यदि ज्ञान-भक्ति-वैराग्य फिर से प्रतिष्ठित हो जाएँ, तो स्वस्थता आ जाएगी । श्रीभरत ने यही उपाय बताया ।

Thursday, 11 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

लंका का युद्ध समाप्त हो जाने के बाद श्रीराघवेन्द्र ने लक्ष्मणजी से पूछा - अयोध्या से लेकर लंका तक तुमने बहुत लम्बी यात्रा की । इस सारी यात्रा में तुम्हें सबसे अधिक आनन्द कब आया ? लक्ष्मणजी ने कहा - महाराज ! जागते हुए तो मैंने बहुत-सी यात्रा की । पर सोये-सोये जो यात्रा हुई उसमें ही सबसे अधिक आनन्द आया । कब ? जब सन्त ने अपनी गोद में उठाकर मुझे आपकी गोद में पहुँचा दिया तब । भगवान और सन्त का सम्बन्ध यही है । हनुमानजी लक्ष्मणजी को अपनी गोद में उठाकर ले गये और भगवान की गोद में रख दिया । लक्ष्मणजी बोले - महाराज ! कैसी विलक्षण थी यह यात्रा ! एक पग भी नहीं चलना पड़ा और आपकी गोद में आया तब मुझे एक नया सुख मिला । शेष के रूप में आपको अपनी गोद में सुलाने का सुख तो मिला था, पर आपकी गोद में सोने का जो सुख है, वह तो मुझे हनुमानजी की कृपा से ही मिला है ।

Wednesday, 10 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

हनुमानजी के लंका से लौट आने के बाद उनसे सीताजी का दुख सुनकर भगवान राम रोने लगे । यह स्वरूप की विस्मृति है । हनुमानजी भगवान की आँखों में आँसू देखकर तुरन्त उन्हें स्वरूप की स्मृति दिलाते हुए बोले - महाराज ! इन राक्षसों को नष्ट करना क्या आपके लिए कोई कठिन कार्य है ? जब आप निश्चय कर लेंगे तो क्या इन राक्षसों को नष्ट करने में कोई विलम्ब होगा ? भगवान राम को अपने स्वरूप की स्मृति आई और प्रभु ने तुरन्त सुग्रीव से कहा -
       अब विलम्बु केहि कारन कीजे ।
        तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ।।
इस प्रकार हनुमानजी ने एक ओर भक्ति का संशय दूर करके उन्हें विश्वास प्रदान किया और ज्ञान को स्वरूप की स्मृति दिलाई । केवल वैराग्य ही संकट से बच गये थे, पर लंका के रणांगण मे वे भी संकट में पड़ गए । मेघनाद ने लक्ष्मणजी को मूर्छित कर दिया था । यहाँ भी औषधि लाने और लक्ष्मणजी को चैतन्य करने की सारी भूमिका हनुमानजी सम्पन्न करते हैं । इस प्रकार से ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के संकट का निराकरण हनुमानजी के द्वारा होता है ।

Tuesday, 9 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

......कल से आगे......
ज्ञान के संदर्भ में महत्वपूर्ण बात है, स्वरूप की स्मृति । इसीलिए श्रीसीताजी ने हनुमानजी से पूछा कि हनुमान ! प्रभु तो अनन्त ऐश्वर्यशाली हैं, अनन्त शक्तिशाली हैं, अनन्त सामर्थवान हैं । तो फिर वे रावण को मारकर मुझे ले क्यों नहीं जाते ? तो स्वभाव में तो कोई बदलाव नहीं आया पर प्रभाव में तो कुछ-न-कुछ कमी आ गयी न ? क्या पहले जैसी सर्वसमर्थता अब उनमें नहीं रह गई ? तब हनुमानजी ने देखा कि स्वभाव का संकट मिटा तो अब प्रभाव का संकट आ पड़ा । उन्होंने तुरन्त माँ से कहा कि प्रभाव भी ज्यों-का-त्यों है, पर प्रभु के सामने एक समस्या है - आपके वियोगजन्य दुख में वे इतने डूब गये हैं कि उन्हें अपने बाण की महिमा का स्मरण नहीं रहा । प्रभाव है पर प्रभाव की याद नहीं है । यहाँ पर गोस्वामीजी ने बड़ी दार्शनिक बात कही कि स्मृति में ही सुख है । कोई व्यक्ति चाहे वह कोई भी क्यों न हो, अपने स्वरूप की स्मृति न रहने पर समग्र रूप से सुखी नहीं हो सकता । तो माँ ने कहा, बस, अब तुम जाकर उन्हें जयन्त की कथा सुनाना और उन्हें स्मरण दिलाना कि उनकी बाणों में कितना सामर्थ्य है । हनुमानजी जब भगवान के बाणों की महिमा बखान कर रहे थे - हे जानकीजी  ! रामबाण रूपी सूर्य का उदय होने पर, राक्षसों की सेना रूपी अन्धकार कहाँ रह सकता हैं । तब माँ बोली, मुझे क्या सुना रहे हो, उन्हें सुनाना । मैं सुनकर क्या करूँगी ? मैं तो जब प्रत्यक्ष देखूँगी, तभी मानूँगी ।

Monday, 8 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

अशोकवाटिका में हनुमानजी ने जब भगवान की सुन्दर कथा श्रीसीताजी को सुनायी, तब कथा सुनकर माँ के ह्रदय का दुख दूर हो गया । और सीताजी के मुख से निकला - किसने इतनी मधुर कथा सुनाई, वह सामने क्यों नहीं आता । और तब हनुमानजी वृक्ष से कूद पड़े । माँ ने जब देखा तो तुरन्त पीठ फेर लिया । हनुमानजी की ओर देखना भी पसन्द नहीं किया और कह दिया - नर बानरहिं संग कहु कैसे । हनुमानजी ने जैसे संगति हुई वह सारी कथा कही - कही कथा भइ संगति जैसे । - पहले कथा पर विश्वास, पर कथावाचक पर अविश्वास हो गया था । और अब कथावाचक पर विश्वास हुआ तब अचानक प्रभु के स्वभाव पर सन्देह हो गया । वे हनुमानजी से कहने लगीं - हमारे प्रभु तो पहले बड़े कोमल स्वभाव के थे, अब इतने कठोर कैसे हो गए । भक्ति सुरक्षित कब रहेगी ? भक्ति तो हम तभी कर पाएँगे जब हमें भगवान में कोमलता दिखाई देगी । यदि हमें भगवान में कठोरता दिखाई देने लगे तो उनके प्रति राग और प्रीति हो ही नहीं सकती, तो हनुमानजी ने कहा कि माँ क्षमा करना, मैं धृष्टता कर रहा हूँ, आप तो प्रभु से प्रेम करती हैं न ! बोलीं - हाँ करती हूँ । तो हनुमानजी ने कहा - बस माँ ! आप उनसे जितना प्रेम करती हैं, उससे दूना प्रेम वे आपसे करते हैं । यह सुनकर श्रीसीताजी को भगवान के स्वभाव के प्रति विश्वास तो हो गया, पर उन्होंने एक सुन्दर प्रश्न किया ।
       .......आगे कल .....

Sunday, 7 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

ज्ञान के सामने समस्या है स्वरूप विस्मृति की और भक्ति के सामने संशय की । और इसके निराकरण की भूमिका है हनुमानजी की । भगवान राम ने हनुमानजी को काम सौंपा कि जाकर सीताजी को मेरा संदेश सुनाओ । हनुमानजी ने लंका में जाकर क्या किया ? जिस संशय के कारण भक्ति भगवान से दूर हो गयी थी, उस संशय को हनुमानजी ने भगवान की कथा की दिव्य औषधि के द्वारा दूर किया । रामकथा के विषय में गोस्वामीजी ने बताया कि इसके अनेक रूप हैं और उनमें से एक रूप वैद्य का भी है ।
     सद्गुर ग्यान विराग जोग के ।
     बिबुध बैद भव भीम रोग के ।।
- भगवान की कथा ज्ञान, वैराग्य और योग के लिए सद्गुरु है, और संसाररुपी भयंकर रोग का नाश करने के लिए देवताओं के वैद्य  (अश्विनीकुमार) के समान है । तो हनुमानजी ने भगवान की यह सुन्दर कथा श्रीसीताजी को सुनायी जो स्वयं वैद्य भी है और औषधि भी । कथा सुनकर पहले तो माँ के ह्रदय का दुख दूर हो गया, शान्ति की अनुभूति हुई और अन्त में उनके मन में जो संशय था, वह दूर हो गया ।
       रामचन्द्र गुन बरनैं लागा ।
       सुनतहिं सीता कर दुख भागा ।।

Saturday, 6 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जहाँ ज्ञान भ्रम के पीछे, प्रलोभन के पीछे भाग गया, वहाँ परिणाम क्या हुआ ? ज्ञान-भक्ति-वैराग्य तीनों ही संकट में पड़ गए । अब इस संकट से उन्हें उबारता कौन है ? तो यहाँ पर संकट से उबारने वाले हनुमानजी की भूमिका आती है । हनुमानजी कौन हैं ? हनुमानजी प्रबल वैराग्य हैं । एक ओर तो वैराग्य लक्ष्मणजी के रूप में जीवन से दूर चला गया और ज्ञान-भक्ति संकट में पड़ गए । दूसरी ओर इस ज्ञान-भक्ति के दुख को दूर करने की भूमिका वैराग्य के द्वारा ही पूर्ण होती है । हनुमानजी की भूमिका क्या है ? वे ज्ञान के संकट को दूर करने वाले, भक्ति के संकट को दूर करने वाले और इन बिछुड़े हुए सबको मिलाने वाले हैं । जिन दुर्गुणों-दूर्विचारों के कारण ज्ञान-भक्ति-वैराग्य साथ रहते हुए भी अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं, सीताजी दूर चली गयी हैं, भगवान राम विलाप करते हुए वन में चारों ओर भटक रहें हैं और लक्ष्मणजी साथ होते हुए भी भगवान राम को सान्त्वना नहीं दे पा रहें हैं, अब उन कारणों को दूर करते हैं हनुमानजी ।

Friday, 5 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भगवान राम ने मारीच की माया को स्वीकार कर लिया । आज सारा क्रम उलट गया है । जब शूर्पणखा की माया आई तो भगवान ने भक्ति की ओर देखा, माया के मिथ्यात्व को देखा ही नहीं । पर आज तो श्रीसीताजी ने ही उस मायामृग को देख लिया । और देखा ही नहीं बल्कि भगवान से कहने लगीं - इस मृग का चर्म बड़ा सुन्दर है, मारकर इसकी छाल ले आइए । और भगवान ने उस भ्रम को स्वीकार कर लिया । वे धनुष-बाण लेकर उस मायामृग के पीछे, भ्रांति के पीछे चल पड़े । ज्ञान संकट में कब पड़ता है ? जब माया और भ्रांति के पीछे भागता है, अवास्तविकता के पीछे भागता है । इसलिए आगे चलकर भगवान राम की आँखों में आँसू दिखाई देते हैं । उनका विलाप दिखाई देता है । और भक्ति संकट में क्यों पड़ गई ? भक्ति की दृष्टि से देखें तो स्वर्णमृग संशय की सृष्टि करने वाला है । भगवान राम जब इस मृग पर प्रहार करते हैं तब वह लक्ष्मण का नाम लेकर पुकारता है और उसका वह स्वर सुनकर सीताजी को यह भ्रम हो जाता है कि यह भगवान राम का स्वर है । और उसका परिणाम यह हुआ कि ईश्वर के बल के प्रति संशय उत्पन्न हो गया । लक्ष्मण के चरित्र के प्रति संशय उत्पन्न हो गया । मृग ने भ्रम उत्पन्न किया तो ज्ञान दूर चला गया और संशय उत्पन्न किया तो भक्ति की वृत्ति विपरित हो गई । और आगे चलकर श्रीसीताजी ने लक्ष्मणजी से ऐसे शब्द कह दिए कि लक्ष्मणजी व्याकुल हो गए - और तब सीताजी को छोड़कर लक्ष्मणजी दूर चले जाते हैं, वैराग्य दूर चला जाता है ।

Thursday, 4 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

शूर्पणखा रावण के पास जाती है । और तब रावण क्या करता है ? रावण स्वर्णमृग लेकर जाता है । यह स्वर्णमृग क्या है ? इसे हम क्रमशः ज्ञान, भक्ति और कर्म के संदर्भ में देखने की चेष्टा करेंगे । यह मृग नकली है । मारीच स्वर्णमृग बना हुआ है । यह मारीच तीन चीजों की सृष्टि करता है । ज्ञान की दृष्टि से मार्ग में सबसे बड़ी बाधा भ्रम है, भक्ति की दृष्टि से सबसे बड़ी बाधा है संशय और कर्म की दृष्टि से सबसे बड़ी बाधा है प्रलोभन । ज्ञान के संदर्भ में यह मारीच भ्रम है, मायामृग है । माया भ्रम की सृष्टि कर देती है, अवास्तविकता में वास्तविकता की स्वीकृति या प्रतीति करा देती है । शूर्पणखा ने भी माया का प्रयोग किया था । नकली रूप बनाकर गयी थी । पर वहाँ भगवान राम ने यह दिखा दिया कि किस तरह से माया से, भ्रम से बचा जा सकता है । और यहाँ पर वे इसका दूसरा पक्ष भी हमारे सामने रख दे रहे हैं कि व्यक्ति जरा भी असावधान रहे तो किस प्रकार वह भ्रम के द्वारा माया के जाल में फँस जाता है ।

Wednesday, 3 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

दण्डकारण्य में चौदह हजार राक्षस आपस में ही एक दूसरे को मारकर समाप्त हो गए । भगवान श्रीराघवेन्द्र की विजय हुई । लक्ष्मणजी सीताजी को लेकर आते हैं । काम, क्रोध और लोभ की पराजय हो गई है । ज्ञान-भक्ति-वैराग्य पुनः एकत्रित हो गए । इन चौदह हजार राक्षसों सहित खर-दूषण के विनाश के बाद, समस्त दुर्गुणों और दुर्विचारों के दूर हो जाने बाद, ज्ञान-भक्ति-वैराग्य पुनः प्रतिष्ठित हुए ; पर क्या इससे समस्या का समूल नाश हो गया ? गोस्वामीजी कहते हैं - नहीं ! खर-दूषण तो उस रोगवृक्ष की केवल शाखा- प्रशाखाएँ थे । और उसकी जड़ कहाँ है ? सारी समस्याओं का मूल क्या है ? मोह ही इन समस्त रोगों की जड़ है । और इसलिए खर-दूषण के मारे जाने पर शूर्पणखा दिखाई तो नहीं देती पर वह जाती नहीं है । सद्विचारों के उदय होने पर वासना दिखाई नहीं देती पर वह मरती नहीं, बल्कि अन्तःकरण के किसी कोने में छिपी रहती है और दबे पाँव पहुँच जाती है मूल में अर्थात मोह के पास ।

Tuesday, 2 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीराम अकेले और चौदह हजार राक्षस ; एक व्यक्ति चौदह हजार को कैसे जीतेगा ? भगवान राम ने कैसे जीता ? लिखा है कि बाण का प्रयोग करने पर भी इन राक्षसों की मृत्यु नहीं होती । मारने से तो मरेंगे नहीं । तब भगवान ने क्या किया ? उन्होंने अद्वैत तत्त्व का प्रयोग किया और विजय प्राप्त की । यह बड़ी अद्भुत बात है । श्रीराम की विजय अद्वैत तत्त्व की विजय है । और इन दैत्यों की पराजय माने इनकी द्वैतमूलक वृत्ति की पराजय । यह द्वैत और अद्वैत का संघर्ष है । इस युद्ध में भगवान राम ने अचानक बाण चलाना बन्द कर दिया और एक कौतुक किया । समस्त ब्रह्मांड ही तो ईश्वर का रूप है । भगवान श्रीराघवेन्द्र तो अखण्ड ज्ञान में स्थित हैं ही । उन्होंने समस्त चौदह हजार राक्षसों को राम बना दिया । और यह उनके स्वभाव के अनुकूल ही है । और तब क्या होता है ? प्रत्येक राक्षस अपने सामने राम को देखता है और उस पर प्रहार करता है । इस तरह चौदह हजार राक्षस आपस में ही लड़कर स्वयं ही समाप्त हो गए । यही द्वैत बुद्धि की परिणति है । यदि वे चौदह हजार राक्षस सामने राम को देखने के साथ ही अपनी ओर भी देखने की चेष्टा करते तो उन्हें यही दिखाई देता कि सामने जो राम है वही राम मैं भी हूँ, आगे-पीछे, आजू-बाजू चारों ओर राम ही राम, फिर तो सारा झगड़ा ही मिट जाता । पर वे तो अपनी ओर देखने के अभ्यस्त ही नहीं हैं, उसका तो नाम ही है दूषण, वासना की वृत्ति वाले, दूसरों का दोष देखने वाले, अपना दोष नहीं देखते ।

Monday, 1 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

दण्डकारण्य में चौदह हजार राक्षस जब अकेले श्रीराम के ऊपर आक्रमण कर देते हैं तो ये कोटि-कोटि देवता सब कहाँ चले गये थे ? ये सब राक्षस तो देवताओं के शत्रु हैं, उन्हें तो भगवान राम की सहायता के लिए तुरन्त आना चाहिए था । और यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो ये चौदह हजार राक्षस यदि दुर्गुण-दुर्विचार हैं तो समस्त देवता सद्गुण-सद्विचार हैं । और जहाँ दुर्गुण-दुर्विचार को मिटाने का प्रश्न हो, वहाँ तो सद्गुण-सद्विचार की सशक्त भूमिका होनी चाहिए । पर उनका तो कहीं पता ही नहीं । इसका तात्पर्य क्या है ? यह एक आध्यात्मिक सत्य है । सद्गुण-सद्विचार अपने आप में भले ही अच्छे हों, पर वे दुर्गुणों-दुर्विचारों को मिटाने सक्षम नहीं हैं ।