Sunday, 21 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

एक बार रावण और सहस्त्रार्जुन के बीच भी टकराहट हो गई । लेकिन रावण सहस्त्रार्जुन को नहीं जीत पाया । जीत भी नहीं सकता था । इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि सहस्त्रार्जुन जैसे लोभ का प्रतीक है, रावण मोह का प्रतीक है । अभिप्राय यह है कि लोभ और मोह की वृत्तियों में टकराहट होने पर बड़ी विचित्र बात है कि मोह लोभ से परास्त हो गया । बुद्धि ने मोह को पराजित कर दिया, पर स्वयं दुर्गुणों से मुक्त नहीं हो सकी है । यद्यपि मोह की वृत्ति सहस्त्रार्जुन के जीवन में प्रबल नहीं है, पर लोभ की वृत्ति अत्यंत प्रबल हो गयी है ।

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