Tuesday, 2 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीराम अकेले और चौदह हजार राक्षस ; एक व्यक्ति चौदह हजार को कैसे जीतेगा ? भगवान राम ने कैसे जीता ? लिखा है कि बाण का प्रयोग करने पर भी इन राक्षसों की मृत्यु नहीं होती । मारने से तो मरेंगे नहीं । तब भगवान ने क्या किया ? उन्होंने अद्वैत तत्त्व का प्रयोग किया और विजय प्राप्त की । यह बड़ी अद्भुत बात है । श्रीराम की विजय अद्वैत तत्त्व की विजय है । और इन दैत्यों की पराजय माने इनकी द्वैतमूलक वृत्ति की पराजय । यह द्वैत और अद्वैत का संघर्ष है । इस युद्ध में भगवान राम ने अचानक बाण चलाना बन्द कर दिया और एक कौतुक किया । समस्त ब्रह्मांड ही तो ईश्वर का रूप है । भगवान श्रीराघवेन्द्र तो अखण्ड ज्ञान में स्थित हैं ही । उन्होंने समस्त चौदह हजार राक्षसों को राम बना दिया । और यह उनके स्वभाव के अनुकूल ही है । और तब क्या होता है ? प्रत्येक राक्षस अपने सामने राम को देखता है और उस पर प्रहार करता है । इस तरह चौदह हजार राक्षस आपस में ही लड़कर स्वयं ही समाप्त हो गए । यही द्वैत बुद्धि की परिणति है । यदि वे चौदह हजार राक्षस सामने राम को देखने के साथ ही अपनी ओर भी देखने की चेष्टा करते तो उन्हें यही दिखाई देता कि सामने जो राम है वही राम मैं भी हूँ, आगे-पीछे, आजू-बाजू चारों ओर राम ही राम, फिर तो सारा झगड़ा ही मिट जाता । पर वे तो अपनी ओर देखने के अभ्यस्त ही नहीं हैं, उसका तो नाम ही है दूषण, वासना की वृत्ति वाले, दूसरों का दोष देखने वाले, अपना दोष नहीं देखते ।

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