Thursday, 4 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

शूर्पणखा रावण के पास जाती है । और तब रावण क्या करता है ? रावण स्वर्णमृग लेकर जाता है । यह स्वर्णमृग क्या है ? इसे हम क्रमशः ज्ञान, भक्ति और कर्म के संदर्भ में देखने की चेष्टा करेंगे । यह मृग नकली है । मारीच स्वर्णमृग बना हुआ है । यह मारीच तीन चीजों की सृष्टि करता है । ज्ञान की दृष्टि से मार्ग में सबसे बड़ी बाधा भ्रम है, भक्ति की दृष्टि से सबसे बड़ी बाधा है संशय और कर्म की दृष्टि से सबसे बड़ी बाधा है प्रलोभन । ज्ञान के संदर्भ में यह मारीच भ्रम है, मायामृग है । माया भ्रम की सृष्टि कर देती है, अवास्तविकता में वास्तविकता की स्वीकृति या प्रतीति करा देती है । शूर्पणखा ने भी माया का प्रयोग किया था । नकली रूप बनाकर गयी थी । पर वहाँ भगवान राम ने यह दिखा दिया कि किस तरह से माया से, भ्रम से बचा जा सकता है । और यहाँ पर वे इसका दूसरा पक्ष भी हमारे सामने रख दे रहे हैं कि व्यक्ति जरा भी असावधान रहे तो किस प्रकार वह भ्रम के द्वारा माया के जाल में फँस जाता है ।

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