हनुमानजी के लंका से लौट आने के बाद उनसे सीताजी का दुख सुनकर भगवान राम रोने लगे । यह स्वरूप की विस्मृति है । हनुमानजी भगवान की आँखों में आँसू देखकर तुरन्त उन्हें स्वरूप की स्मृति दिलाते हुए बोले - महाराज ! इन राक्षसों को नष्ट करना क्या आपके लिए कोई कठिन कार्य है ? जब आप निश्चय कर लेंगे तो क्या इन राक्षसों को नष्ट करने में कोई विलम्ब होगा ? भगवान राम को अपने स्वरूप की स्मृति आई और प्रभु ने तुरन्त सुग्रीव से कहा -
अब विलम्बु केहि कारन कीजे ।
तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ।।
इस प्रकार हनुमानजी ने एक ओर भक्ति का संशय दूर करके उन्हें विश्वास प्रदान किया और ज्ञान को स्वरूप की स्मृति दिलाई । केवल वैराग्य ही संकट से बच गये थे, पर लंका के रणांगण मे वे भी संकट में पड़ गए । मेघनाद ने लक्ष्मणजी को मूर्छित कर दिया था । यहाँ भी औषधि लाने और लक्ष्मणजी को चैतन्य करने की सारी भूमिका हनुमानजी सम्पन्न करते हैं । इस प्रकार से ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के संकट का निराकरण हनुमानजी के द्वारा होता है ।
अब विलम्बु केहि कारन कीजे ।
तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ।।
इस प्रकार हनुमानजी ने एक ओर भक्ति का संशय दूर करके उन्हें विश्वास प्रदान किया और ज्ञान को स्वरूप की स्मृति दिलाई । केवल वैराग्य ही संकट से बच गये थे, पर लंका के रणांगण मे वे भी संकट में पड़ गए । मेघनाद ने लक्ष्मणजी को मूर्छित कर दिया था । यहाँ भी औषधि लाने और लक्ष्मणजी को चैतन्य करने की सारी भूमिका हनुमानजी सम्पन्न करते हैं । इस प्रकार से ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के संकट का निराकरण हनुमानजी के द्वारा होता है ।
No comments:
Post a Comment