Sunday, 14 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रामचरितमानस की कथा के समापन में मानस रोगों का स्वरूप बताते हुए काकभुशुण्डिजी ने आयुर्वेद में दी गयी स्वस्थता और अस्वस्थता की परिभाषा को ही आधार बनाकर व्यक्ति और समाज के स्वस्थता के स्वरूप को प्रकट किया है । आयुर्वेद में त्रिधातु की स्वीकृति है और वे हैं - कफ, वात और पित्त । काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि व्यक्ति के मन में भी ये त्रिधातु विद्यमान हैं । काम, क्रोध और लोभ की वृत्तियाँ ही मन का वात, पित्त और कफ हैं । जब व्यक्ति या समाज के जीवन में ये वृत्तियाँ सन्तुलित रहती हैं, तभी वह स्वस्थ रहता है । जब काम के द्वारा केवल सृजन का लक्ष्य सामने रखा जाता है, क्रोध के द्वारा बुराइयों को मिटाने का लक्ष्य रहता है और लोभ के द्वारा लोकसेवा के लिए धनसंग्रह का लक्ष्य होता है, तभी काम, क्रोध और लोभ समाज में सार्थक होते हैं ।

No comments:

Post a Comment