कामधेनु एक ओर जहाँ परदुखकातर महात्माओं के पास कल्याणकारी है, वहीं दूसरी ओर भोगपारायण व्यक्ति के पास उतनी ही विनाशकारी भी है । एक ओर सदुपयोग हो सकता है तो दूसरी ओर उसका दुरुपयोग भी सम्भव है । भोगपारायण व्यक्ति संकल्पमात्र से भोग की वस्तुएँ पा लेने की स्थिति में कर्मशून्य होकर अपरिमित भोग में डूब जाएगा । समस्त भोगों को अपने लिए समेटकर वह सदा दूसरों के लिए अमंगल और दुख कष्ट की कामना करेगा । इसलिए मुनि जमदग्नि ने स्पष्ट कह दिया कि कामधेनु राजा के पास नहीं मुनि के ही पास रहेगी । और तब उस राजा के असंतुलित लोभ का परिणाम प्रकट हो गया । पहले तो उसे ईर्ष्या हुई, फिर लोभ और अब लोभ की पराकाष्ठा यह है कि बलपूर्वक छीन लेने की चेष्टा होने लगी । सामनेवाला व्यक्ति अगर माँगने पर न दे और लोभ शान्त हो जाए, तब तो वह नियन्त्रित लोभ है । लेकिन अगर उस इन्कार से क्रोध आ जाय और बलपूर्वक छीनने का प्रयास आरम्भ हो जाय, तो समझ लेना होगा कि व्यक्ति के मन, बुद्धि और अहंकार - तीनों ही लोभ से आक्रांत हो गये हैं और साथ ही त्रिधातु भी कुपित हो गये हैं ।
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