Saturday, 20 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

काम, क्रोध और लोभ ये तीनों यद्यपि मन के रोग कहे जाते हैं । पर अन्तःकरण की दृष्टि से अलग-अलग बाँटकर कहें तो काम मन प्रधान है । लोभ से बुद्धि जुड़ी हुई है और क्रोध से अहंकार संयुक्त है । अगर ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्ट दिखाई देगा कि व्यक्ति के अन्तःकरण में जब काम की वृत्ति आती है तो वह सबसे पहले उसके मन को आक्रांत करती है । मन जब भोग के लिए व्याकुल होने लगता है, तब इसी भोग-पिपासा को मिटाने के लिए वह काम का आश्रय लेता है । और लोभ ? लोभ जब आता है तो उसे स्थान देती है बुद्धि । बुद्धि उसका समर्थन करती है । लोभ दिखाई तो देता है मन में, पर बुद्धि उसके समर्थन में बड़े जोर-शोर से तर्क देती है । व्यक्ति लोभ क्यों करता है ? बुद्धि कहती है, बुढ़ापे में क्या करोगे ? परिवार की वृद्धि होगी, तब क्या होगा ? भविष्य की चिन्ता करना तो एक सजग व्यक्ति का कर्तव्य है । बुद्धि व्यक्ति के सामने भविष्य की चिन्ता खड़ी कर देती है । व्यक्ति सोचता है कि इतना संग्रह कर लें कि जिससे भविष्य में निश्चिन्त होकर रह सकें । इस तरह लोभ की वृत्ति में बुद्धि की सक्रियता दिखाई देती है । क्रोध अहं प्रधान है । अहं जितना तीव्र होगा, क्रोध भी उतना तीव्र होगा । सामनेवाला व्यक्ति मेरी बात क्यों नहीं सुनता, मेरी बात क्यों नहीं मानता, मेरी बात क्यों टालता रहता है ? इसी बात को लेकर क्रोध आ जाता है ।चित्त इन तीनों के पीछे है । मन, बुद्धि और अहंकार में से अगर कोई एक अस्वस्थ हो और अन्य स्वस्थ, तो चिकित्सा करना सरल होता है । पर मन के साथ बुद्धि और अहंकार भी अस्वस्थ हों और पीछे से चित्त भी संस्कार के रूप में उन्हें शक्ति देता रहे, तो उस व्यक्ति की चिकित्सा करना बड़ा कठिन हो जाता है ।

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