भगवान राम ने मारीच की माया को स्वीकार कर लिया । आज सारा क्रम उलट गया है । जब शूर्पणखा की माया आई तो भगवान ने भक्ति की ओर देखा, माया के मिथ्यात्व को देखा ही नहीं । पर आज तो श्रीसीताजी ने ही उस मायामृग को देख लिया । और देखा ही नहीं बल्कि भगवान से कहने लगीं - इस मृग का चर्म बड़ा सुन्दर है, मारकर इसकी छाल ले आइए । और भगवान ने उस भ्रम को स्वीकार कर लिया । वे धनुष-बाण लेकर उस मायामृग के पीछे, भ्रांति के पीछे चल पड़े । ज्ञान संकट में कब पड़ता है ? जब माया और भ्रांति के पीछे भागता है, अवास्तविकता के पीछे भागता है । इसलिए आगे चलकर भगवान राम की आँखों में आँसू दिखाई देते हैं । उनका विलाप दिखाई देता है । और भक्ति संकट में क्यों पड़ गई ? भक्ति की दृष्टि से देखें तो स्वर्णमृग संशय की सृष्टि करने वाला है । भगवान राम जब इस मृग पर प्रहार करते हैं तब वह लक्ष्मण का नाम लेकर पुकारता है और उसका वह स्वर सुनकर सीताजी को यह भ्रम हो जाता है कि यह भगवान राम का स्वर है । और उसका परिणाम यह हुआ कि ईश्वर के बल के प्रति संशय उत्पन्न हो गया । लक्ष्मण के चरित्र के प्रति संशय उत्पन्न हो गया । मृग ने भ्रम उत्पन्न किया तो ज्ञान दूर चला गया और संशय उत्पन्न किया तो भक्ति की वृत्ति विपरित हो गई । और आगे चलकर श्रीसीताजी ने लक्ष्मणजी से ऐसे शब्द कह दिए कि लक्ष्मणजी व्याकुल हो गए - और तब सीताजी को छोड़कर लक्ष्मणजी दूर चले जाते हैं, वैराग्य दूर चला जाता है ।
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