परशुरामजी ने सहस्त्रार्जुन की एक हजार भुजाओं को काट दिया और क्षत्रियों को दण्ड दिया । सहस्त्रार्जुन का दमन करने से क्या अभिप्राय है ? सहस्त्रार्जुन लोभ का प्रतीक है । उसके चरित्र का वर्णन इस प्रकार मिलता है - सहस्त्रार्जुन एक योग्य राजा था, वह बड़ा पुरूषार्थी था और बड़ी कुशलता से समाज का संचालन करता था । उसकी एक हजार भुजाएँ थी और उनमें कर्म करने की अद्भुत क्षमता थी । ऐसी क्षमता यदि किसी व्यक्ति को प्राप्त हो जाय तो वह कल्याणकारी भी हो सकता है और अकल्याणकारी भी । और ये दोनों ही पक्ष हमें सहस्त्रार्जुन के जीवन में दिखाई देते हैं । हजार भुजाओं से अद्भुत कर्म करने की क्षमता का उपयोग यदि व्यक्ति दूसरों की सेवा, परोपकार और रक्षा करने के लिए करे तो वह कल्याणकारी हो सकता है । जैसा कि सहस्त्रार्जुन के जीवन में पहले था । लेकिन इस कार्यक्षमता के साथ अगर लोभ जुड़ जाय और वह बढ़कर अपार और असंतुलित हो जाय तो वह अकल्याणकारी हो जाता है । और कर्म के साथ इसकी सम्भावना जुड़ी रहती है । कर्म करने की प्रेरणा जितनी ही तीव्र होगी, आकांक्षाएँ भी उतनी ही तीव्र होंगी । साथ में स्वार्थपरता और लोभ की वृत्ति रहती है । सहस्त्रार्जुन के साथ भी यही हुआ । और केवल सहस्त्रार्जुन ही क्यों, सम्पूर्ण क्षत्रिय जाति में यह वृत्ति आ गई । इसके परिणामस्वरूप राजाओं में यह रोग फैल गया कि अधिक-से-अधिक देशों पर अधिकार करके मनमाने ढंग से प्रजा का शोषण करो और केवल अपने ही श्री, वैभव तथा भोग की चिन्ता करो ।
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