Thursday, 18 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

आयुर्वेद में कहा गया है कि व्यक्ति के शरीर में वात, पित्त और कफ में से कोई एक कुपित हो जाय तो उसकी चिकित्सा अपेक्षाकृत सरल होती है लेकिन तीनों यदि एक साथ कुपित हो जाएँ तो उसकी चिकित्सा करना सहज नहीं है । इसी प्रकार जब व्यक्ति के जीवन में काम, क्रोध और लोभ, तीनों वृत्तियाँ एक साथ विकृत हो जाएँ, तब समस्या जटिल हो जाती है । रामचरितमानस में इसका सुन्दर दृष्टांत है । परशुरामजी को हम अवतार मानते हैं । उनका अवतार क्यों हुआ ? उनके होते हुए समाज को श्रीराम की आवश्यकता क्यों हुई ? इसका उत्तर यह दिया गया कि परशुरामजी ने समाज की एक समस्या का समाधान किया, पर उसकी प्रतिक्रिया अपने आप में एक समस्या बन गई ।

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