काम-क्रोध-लोभ के स्थान पर ज्ञान-भक्ति-वैराग्य की पुनः प्रतिष्ठा के लिए श्रीभरतजी समाज को लेकर भगवान श्रीराघवेन्द्र के पास चित्रकूट जाते हैं । भगवान श्रीराघवेन्द्र ने मुस्कराकर श्रीभरत को लौटा दिया । कह दिया कि नहीं भरत, इस समय मेरी भूमिका से काम नहीं चलेगा । यह भूमिका तो अकेले तुम्हें ही पूरी करनी है । क्यों ? इसलिए कि हम तीनों ज्ञान-भक्ति-वैराग्य के रहते हुए भी काम-क्रोध-लोभ आ गया तो इसका अर्थ तो यही है कि अब मुझसे भी बड़ा कोई चिकित्सक चाहिए । तो यह कार्य अब तुम्हारा है । और तब श्रीभरत क्या करते हैं ? अपने चरित्र के द्वारा काम-क्रोध-लोभ को नष्ट कर उस पर विजय प्राप्त करते हैं । राज्य नहीं लेते, यह उनकी लोभ पर विजय है । मन्थरा को दण्ड से मुक्त कर देते हैं, यह उनकी क्रोध पर विजय है और नन्दीग्राम में तपस्या करते हैं यह उनकी काम पर विजय है । स्वयं श्रीभरत तो स्वस्थ हैं ही, पर अयोध्या का सारा दुख-संकट इस काम-क्रोध-लोभ के कारण ही है । जब जीवन में दुख आवे तो समझ लेना चाहिए कि काम-क्रोध-लोभ - इनमें से कोई न कोई दुर्गुण आ गया है । इन दुर्गुणों और दोषों पर विजय प्राप्त करके ही हम दुखों से छुटकारा पाते हैं ।
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