Wednesday, 17 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

व्यक्ति या समाज में जब काम, क्रोध और लोभ की वृत्ति असंतुलित हो जाती है तो यह असंतुलन मन के साथ मनुष्य की बुद्धि, अहंकार और चित्त तक को आक्रांत कर देता है । गोस्वामीजी इसे अस्वस्थता का गम्भीर लक्षण मानते हैं । वे कहते हैं कि रोग अगर किसी एक अंग में हो या अन्तःकरण के किसी एक भाग में हो तो उसकी चिकित्सा करना सरल है, पर जब मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, चारों ही रोगग्रस्त हो जाएँ अथवा समाज समग्र रूप से रोगग्रस्त हो जाय तो उसकी चिकित्सा करना करना अत्यन्त कठिन हो जाता है । यह बात तो हमें अपने जीवन में भी दिखाई देती है । कई बार जब हमारा मन अस्वस्थ हो जाता है, तो भी बुद्धि स्वस्थ रहती है । इसका परिणाम यह होता है कि जब मन में कोई बुराई आती है तो बुद्धि तुरन्त कह देती है कि यह अशोभनीय है, त्याज्य है । मन पर बुद्धि का नियन्त्रण बना रहता है । इसी प्रकार बहिरंग व्यवहार में मानसिक और भौतिक धरातल पर व्यस्त हो जाने पर भी हमारा चित्त एकांत समाहित और शान्त हो जाए, तो मन की बुराइयों को वहाँ प्रश्रय नहीं मिलता । और व्यक्ति जब विनम्र हो जाता है तब मन की बुराइयों को अहं का समर्थन नहीं मिल पाता । इसी तरह कभी मन, कभी बुद्धि, कभी चित्त और कभी अहंकार अस्वस्थ हो जाते हैं, पर अन्तःकरण-चतुष्ट्य में से किसी एक के अस्वस्थ हो जाने पर शेष तीन स्वस्थ रहते हैं और समस्या गम्भीर नहीं हो पाती । समस्या तो तब जटिल हो जाती है जब अन्तःकरण समग्र रूप से अस्वस्थ हो जाता है । तब उस व्यक्ति की चिकित्सा अत्यन्त कठिन हो जाती है ।

No comments:

Post a Comment